सुनील दास
28 अप्रैल 2026 पं.बंगाल की राजनीति में हिंसा करके लोगों को डराने का एक लंबा व पुराना इतिहास रहा है। चुनाव के पहले और चुनाव के बाद लोगों को डराने के लिए बहुत कुछ कहा जाता रहा है और किया जाता रहा है। पिछले दस साल मे यहां निष्पक्ष चुनाव कराना एक बड़ी चुनौती रही है क्योंकि टीएमसी के शासन में वोट न देने वालों को, वोट के जरिए विरोध करने वालों को चुनाव के पहले हिंसा कर डराया जाता रहा है और चुनाव के बाद वोट न देने वालों के साथ कई तरह की हिंसा की जाती रही है। पिछले दो चुनावों में ऐसा किया जाता रहा है ताकि कोई उनको विरोध करने की हिम्मत न करे और उनके खिलाफ वोट डालने की हिम्मत न कर सके। किसी राज्य मे जब लोग बिना डरे वोट न दे सकें तो वहां लोकतंत्र है इस पर कैसे यकीन किया जा सकता है।
पं. बंगाल मे एक चरण का वोट हो चुका है और दूसरे चरण का वोट बुधवार को होना है। पहले चरण में तो ९० प्रतिशत से ज्यादा वोट होने से माना जा रहा है कि इस बार का चुनाव पिछले दो बार हुए चुनाव से अलग है। इस बार राज्य की जनता को सुरक्षा का एहसास दिलाने का प्रयास सुप्रीम कोर्ट के साथ चुनाव आयोग ने अभूतपूर्व प्रयास किए हैं। वोटिंग के दौरान कोई हिंसा न हो तथा लोग बिना डरे अपने वोट के अधिकार का प्रयोग कर सकें इसके लिए देश के इतिहास में पहली बार बड़ी संख्या में जवान तैनात किए गए है। इस वजह से पहले चरण के मतदान में पहले की तरह हिंसा नहीं हो सकी। एसआईआर के कारण जिनको वोट देने का अधिकार था, वही वोट दे सके हैं और बिना डरे वोट दे सकें है, इससे जनता में यह भरोसा पैदा हुआ है कि वह अब बंगाल में अपने मन से किसी को वोट दे सकते हैं, उन पर वोट डालने के लिए कोई दवाब नहीं डाल सकता।इस वजह से बड़ी संख्या में लोगों ने वोट डाले हैं।
पहले चरण में जनता ने उत्साह से किसी के पक्ष में और किसी के विरोध में जमकर वोट किया है। इससे जीतने वालों के खुशी है कि वह निष्पक्ष व बिना डरे लोगों ने उनको वोट दिया है, वहीं हारने वालों को इस बात का मलाल है कि हमारा आतंक का राज समाप्त हो गया है, हमारा डर खत्म हो गया है। इससे हमको हराने वालों को वोट देने का मौका मिल गया है और वह हमारे खिलाफ वोट देने से सफल रहे हैं। बंगाल मे लोगों ने बिना डरे वोट दिया है, किसी को हराने के लिए वोट दिया है तो इसका श्रेय चुनाव आयोग व सुप्रीम कोर्ट को जाता है। जिन्होंन टीएमसी व ममता की एक नहीं सुनी और उनको वह सब करने की आजादी नही दी जो वह चुनाव में करते रहे हैं और चुनाव जीतते रहे हैं।पहले चरण के वोट के बाद लोगों को इस बात की खुशी है कि वह बंगाल में बदलाव चाहते हैं और उसके लिए वह वोट दे पा रहे हैं।
पं. बंगाल के लोगों के लिए अमित शाह का यह आश्वासन भी मायने रखता है कि पं.बंगाल में चुनाव के बाद भी दो माह सुरक्षा बल के जवान तैनात रहेंगे ताकि चुनाव के बाद टीएमसी के कार्यकर्ता व नेता व अपने विरोधियों व वोट न देने वालों के साथ जो खुल मारपीट व हिसा करते है, वह न कर सकें यानी चुनाव में कोई टीएमसी के खिलाफ वोट देने वाला है तो वह आश्वस्त हो सके कि अब तक चुनाव के बाद जो हिंसा उऩके साथ होती रही है,वह इस बार नहीं होने वाली हैं। पहले चुनाव खत्म होने के बाद टीएमसी वाले चुनाव में उनका साथ न देने वालों से सबक सिखाते रहे हैं। ताकि लोगों में डर रहे कि चुनाव के उनको टीएमसी के कहर से कोई बचाने वाला नहीं है और वह टीएमसी का किसी तरह का कोई विरोध न कर सकें। टीएमसी के खिलाफ वोट देना चाहे तो वोट न दें सकें।
इस चुनाव में टीएमसी के हारने के कई कारण गिनाए जा रहे हैं । एक कारण तो उनका अलोकतांत्रिक रवैया रहा है। उनका लोकतंत्र में भरोसा नहीं रहा है, इस वजह से इस बार पं बंगाल के लोग टीएमसी से निजात पाना चाहते हैं और वह जानते हैं कि टीएमसी से निजात पाने के लिए इस बार चुनाव आयोग व सुप्रीम कोर्ट ने जो काम किए हैं, उससे वह टीएमसी से निजात पा सकते हैं। टीएमसी से निजात पाने के लिए लोग बंपर वोट कर रहे हैं। इसका टीएमसी के नेता समझ रहे है और लोगों को आखिरी बार डराने का प्रयास कर रहे है कि चार मई को बाद आपको कौन बचाएगा। चार मई के बाद सबका हिसाब होगा। इससे पहले टीएमसी जनता का हिसाब करे लगता है कि इस बार जनता ही टीएमसी का हिसाब एक चरण में कर चुकी है और दूसरे चरण मे करने वाली है। जनता से पंगा लेकर कोई राजनीतिक दल सत्ता में ज्यादा दिन नही रह सकता वह दल भले ही टीएमसी ही क्यों न हो।
