कोरबा, 30 जुलाई (वेदांत समाचार)। छत्तीसगढ़ का कोरबा जिला मानव-हाथी द्वंद्व प्रबंधन के क्षेत्र में एक नए मॉडल के रूप में उभर रहा है। यहां वन संरक्षण, आधुनिक तकनीक, ग्रामीणों की भागीदारी और संवेदनशील प्रशासन के बेहतर समन्वय से हाथियों और मानव के बीच संघर्ष को कम करने के लिए प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं। जिला प्रशासन और वन विभाग द्वारा तैयार किए गए इस मॉडल की विशेषता है कि इसमें हाथियों के प्राकृतिक आवास संरक्षण के साथ-साथ आम लोगों की सुरक्षा और आजीविका को भी प्राथमिकता दी जा रही है।
कलेक्टर कुणाल दुदावत के मार्गदर्शन और कटघोरा वनमंडल के डीएफओ कुमार निशांत के नेतृत्व में मानव-हाथी द्वंद्व को नियंत्रित करने के लिए कई आधुनिक उपाय लागू किए गए हैं। कोरबा जिले में हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए तकनीक का व्यापक उपयोग किया जा रहा है, जिससे ग्रामीणों को समय पर अलर्ट मिल सके और संभावित दुर्घटनाओं को रोका जा सके।
कोरबा जिले का लेमरू हाथी रिजर्व लगभग 1 लाख 99 हजार 548 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें कटघोरा, कोरबा, धरमजयगढ़ और सरगुजा वनमंडलों के 11 वन परिक्षेत्र शामिल हैं। इस क्षेत्र में हाथियों के प्राकृतिक आवास, पारंपरिक विचरण मार्गों और संवेदनशील इलाकों की वैज्ञानिक पहचान कर उनके संरक्षण की दिशा में लगातार कार्य किया जा रहा है।

वन विभाग द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), GIS आधारित योजना, डिजिटल मैपिंग और वैज्ञानिक विश्लेषण के माध्यम से हाथियों के कॉरिडोर की निगरानी की जा रही है। इससे हाथियों के प्राकृतिक आवागमन को सुरक्षित रखने और उनके आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने की संभावना को कम करने में मदद मिल रही है।
कोरबा मॉडल की सबसे बड़ी खासियत आधुनिक तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था है। कटघोरा वनमंडल में 24 घंटे संचालित हाथी नियंत्रण केंद्र, टोल फ्री हेल्पलाइन, थर्मल ड्रोन, गजसंकेत मोबाइल ऐप, सीसीटीवी निगरानी और प्रशिक्षित हाथी मित्र दलों के माध्यम से हाथियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। गजसंकेत ऐप के जरिए हाथियों की वास्तविक समय की जानकारी ग्रामीणों तक पहुंचाई जा रही है। सितंबर 2023 से जून 2026 तक इस ऐप पर 1,097 हाथी मूवमेंट एंट्री दर्ज की गई हैं, जबकि इसी अवधि में 2 लाख 68 हजार 782 से अधिक अलर्ट हाथी प्रभावित गांवों के लोगों तक भेजे गए। इससे ग्रामीणों को समय रहते सतर्क होने और सुरक्षित स्थानों पर जाने में सहायता मिली है।

मानव-हाथी संघर्ष के मामलों में भी सुधार देखने को मिला है। वर्ष 2020-21 में जहां हाथी हमलों से 9 लोगों की मौत हुई थी, वहीं वर्ष 2025-26 में यह संख्या घटकर 3 रह गई। वहीं 2024-25 और 2025-26 में मानव घायल होने के मामले शून्य दर्ज किए गए हैं। वन विभाग के अनुसार यह सफलता समय पर सूचना, निगरानी व्यवस्था, हाथी मित्र दलों की सक्रियता और प्रशासन-वन विभाग के बेहतर तालमेल का परिणाम है।
हाथियों से होने वाली संपत्ति और फसल क्षति में भी कमी आई है। वर्ष 2020-21 में जहां 513 मकानों को नुकसान पहुंचा था, वहीं 2025-26 में यह संख्या घटकर 33 रह गई। समय पर अलर्ट और प्रभावी प्रबंधन के कारण नुकसान को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सका है।
जिला प्रशासन द्वारा मानव-हाथी द्वंद्व को केवल नियंत्रण तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसके दीर्घकालिक समाधान पर भी काम किया जा रहा है। ग्रामीणों को हाथियों के व्यवहार, सुरक्षा उपायों और आपात स्थिति में उठाए जाने वाले कदमों की जानकारी दी जा रही है। हाथी मित्र दलों को नियमित प्रशिक्षण दिया जा रहा है और संवेदनशील क्षेत्रों में रात्रिकालीन गश्त बढ़ाई गई है।
हाथी प्रभावित क्षेत्रों के ग्रामीणों की आजीविका मजबूत करने के लिए भी कई योजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। किसान वृक्ष मित्र योजना, लाख उत्पादन, दोना-पत्तल निर्माण, महुआ एवं कोदो प्रसंस्करण, अगरबत्ती निर्माण, सिलाई कार्य और इको-टूरिज्म जैसी गतिविधियों के माध्यम से ग्रामीणों को आय के नए साधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
मानव-हाथी द्वंद्व से प्रभावित लोगों को जल्द राहत पहुंचाने के लिए ऑनलाइन मुआवजा प्रबंधन प्रणाली विकसित करने की तैयारी भी की जा रही है। इस व्यवस्था के लागू होने के बाद जनहानि, पशुहानि, फसल क्षति और संपत्ति नुकसान के मामलों का ऑनलाइन पंजीयन, डिजिटल सत्यापन, आवेदन की ऑनलाइन ट्रैकिंग और समयबद्ध निराकरण संभव हो सकेगा।
कोरबा का यह मानव-हाथी प्रबंधन मॉडल दिखाता है कि आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक योजना, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जनसहभागिता के जरिए मानव और वन्यजीवों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। आने वाले समय में डिजिटल निगरानी, ऑनलाइन मुआवजा प्रणाली और तकनीक आधारित प्रबंधन से कोरबा देश के प्रमुख मानव-हाथी प्रबंधन जिलों में अपनी पहचान मजबूत कर सकता है।

