नई दिल्ली, 30 मई : क्रिकेट की पिच के लिए रोलर अहम होता है. पिच पर ये रोलर मैच से पहले और मिड इनिंग में यानी जब एक टीम की बल्लेबाजी खत्म होती है तो उसके बाद चलता दिखता है. ICC की प्लेइंग कंडिशंस के मुताबिक, बल्लेबाजी करने वाली टीम को रोलर चुनने का अधिकार होता है. ये रोलर हैवी होगा या लाइट, ये भी बैटिंग टीम पर निर्भर करता है. क्वालिफायर 2 में गुजरात टाइटंस का रन चेज शुरू होने से पहले न्यू चंडीगढ़ की पिच पर हैवी रोलर चलाया गया, जिसने मैच पर ऐसा असर डाला कि राजस्थान रॉयल्स 214 रन बनाने के बाद भी हार गई. राजस्थान रॉयल्स के कप्तान रियान पराग ने हैवी रोलर को गुजरात टाइटंस की जीत की बड़ी वजह बताया है.
हैवी रोलर ने GT के लिए बल्लेबाजी की आसान- रियान
रियान पराग के मुताबिक, उनकी टीम राजस्थान रॉयल्स ने जो 215 रन का टारगेट सेट किया था, वो डिफेंडेबल था. लेकिन, उनके लगता है मिड इनिंग में हैवी रोलर ने पिच को बल्लेबाजी के लिए आसान बना दिया, जिसका फायदा गुजरात टाइटंस को मिला. राजस्थान रॉयल्स के कप्तान रियान पराग ने जो कहा उसमें कुछ भी गलत नहीं. इसका पता आपको तब चलेगा जब आम पिच पर हैवी रोलर के चलने के बाद उसके असर के बारे में जानेंगे.
क्या होता है हैवी रोलर और कैसे डालता है मैच पर असर?
हैवी रोलर का वजन 1500 किलोग्राम से 2500 किलोग्राम तक होता है. हैवी रोलर जब चलता है तो वो पिच को पूरी गहराई से दबाता है. वो दरारों को समतल करता है और बाउंस को कम करता है, जिससे पिच में मौजूद गेंदबाजों के लिए मदद कम हो जाती है और बल्लेबाजों के लिए बल्लेबाजी आसान हो जाती है. पिच में मौजूद असमान उछाल को कम करने या सीम मूवमेंट को कुछ वक्त के लिए बेअसर करने के लिए बल्लेबाजी करने वाली टीम हैवी रोलर ही चुनती है.
हैवी रोलर के चलने से पिच की मिट्टी सख्त हो जाती है और उस पर स्पिनर्स को भी मदद नहीं मिल पाती. रियान पराग ने भी मैच के बाद कहा था कि पहली इनिंग में स्पिनर्स को जितनी मदद मिल रही थी, दूसरी पारी में वो देखने को नहीं मिली.
हैवी रोलर से लाइट रोलर कैसे होता है अलग?
अब सवाल है कि हैवी रोलर से लाइट रोलर कैसे अलग है? तो जैसा कि नाम से ही जाहिर होता है, लाइट मतलब हल्का. लाइट रोलर का वजन 500 किलोग्राम से 1000 किलोग्राम तक होता है. इसका इस्तेमाल पिच में मामूली सुधार करने और हल्की दरारों को समतल करने के लिए होता है. ये विकेट की सतह को चिकना करता है. पिच नरम होने पर भी हल्के रोलर का इस्तेमाल होता है. ये पिच की मिट्टी की गहराई पर कोई असर नही डालता.
हल्के रोलर के चलने से बल्लेबाजों के लिए काम उतना आसान नहीं होता, जितना हैवी रोलर चलने पर होता है. हल्के रोलर के चलने के बाद पिच में गेंदबाजों के लिए भी मदद मौजूद होती है. टीमें जब पिच की ऑरिजिनलिटी में ज्यादा बदलाव नहीं चाहती तो हल्के रोलर की मांग करती हैं.
रोलर्स का इतिहास
1930 के दशक में हैवी रोलर काफी अहम थे, जिन्हें ग्राउंड्समैन को खींचकर चलाना पड़ता था. ऐसे रोलर आज भी कई क्रिकेट वेन्यू पर मौजूद हैं. वैसे, अब मैन्युअल रोलर्स की जगह ज्यादातर क्रिकेट ग्राउंड पर मोटरचालित रोलर्स ने ही ले ली है. क्रिकेट के हर फॉर्मेट में रोलर का अहम रोल होता है. लेकिन, टेस्ट क्रिकेट में इसकी अहमियत ज्यादा होती है.
मैच में रोलर कौन चुनता है?
ICC के नियम 10(a) के मुताबिक मैच के दौरान, पिच को बल्लेबाजी वाली टीम के कप्तान के अनुरोध पर रोल किया जा सकता है. नियम 10(c) कहता है कि अगर एक से अधिक रोलर उपलब्ध हैं, तो बल्लेबाजी करने वाली टीम का कप्तान ही ये तय करेगा कि कौन सा रोलर इस्तेमाल किया जाए?

