हाईकोर्ट बोला- शादीशुदा बहन भी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार:शादी के बाद मायके से नाता खत्म नहीं होता, सरकार का आदेश निरस्त, नौकरी देने के निर्देश - vedantsamachar.in

हाईकोर्ट बोला- शादीशुदा बहन भी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार:शादी के बाद मायके से नाता खत्म नहीं होता, सरकार का आदेश निरस्त, नौकरी देने के निर्देश

बिलासपुर,06अगस्त (वेदांत समाचार) । शादी के बाद बेटी का मायके से रिश्ता खत्म नहीं होता। अविवाहित सरकारी कर्मचारी की मौत के बाद उसकी शादीशुदा बहन भी अनुकंपा नियुक्ति की बराबर हकदार है। महज वैवाहिक स्थिति और लैंगिक पूर्वाग्रह के आधार पर किसी महिला को उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।’ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस संजय के. अग्रवाल ने यह टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार के 19 सितंबर 2019 के आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही मृतक की शादीशुदा बहन को अनुकंपा नियुक्ति देने का आदेश दिया है।

दरअसल, बिलासपुर नेहरू नगर के रहने वाले दुर्गेश मिश्रा जांजगीर-चांपा में जिला लोक अभियोजन अधिकारी के पद पर पदस्थ थे। 13 जून 2018 को सेवा में रहते हुए उनका निधन हो गया। मृतक अविवाहित थे। मिश्रा के निधन के बाद उनकी बुजुर्ग मां तारा मिश्रा ने साल राज्य शासन की 2013 की अनुकंपा नीति के तहत अपनी बेटी अमिता दुबे और मृतक की बहन को अनुकंपा नियुक्ति देने की मांग करते हुए आवेदन पेश किया।

राज्य शासन ने खारिज किया आवेदन राज्य सरकार के गृह एवं सामान्य प्रशासन विभाग ने 19 सितंबर 2019 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया था कि अनुकंपा नियुक्ति नीति में विवाहित बहन को अनुकंपा नियुक्ति देने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। शासन के इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। हाईकोर्ट में कहा- शासन की स्पष्ट नीति पीड़ित परिवार ने याचिका में बताया कि सुप्रीम कोर्ट के कुलसुम निशा विरुद्ध यूपी राज्य और सायरा खातून बनाम बिहार राज्य के मामलों में दिए गए फैसलों के अनुसार, केवल शादी हो जाने से किसी बेटी या बहन का अपने मूल परिवार से नाता खत्म नहीं होता।

शासन की नीति में स्पष्ट उल्लेख है कि अविवाहित शासकीय सेवक के निधन पर माता-पिता की अनुशंसा पर उसके भाई-बहन को नियुक्ति दी जाएगी। जब विवाहित बेटे या भाई को अलग नहीं किया जाता, तो केवल शादीशुदा होने के आधार पर बहन के साथ भेदभाव करना संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15(1)का उल्लंघन है। वर्तमान में शादीशुदा बेटियां-बहनें बनती हैं सहारा हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि, अनुकंपा नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य परिवार के कमाऊ सदस्य की असमय मृत्यु के बाद संकटग्रस्त परिवार को तुरंत वित्तीय राहत पहुंचाना है। इसमें मुख्य मानदंड आर्थिक निर्भरता और वित्तीय जरूरत है, न कि वैवाहिक स्थिति।

वर्तमान समाज में कई शादीशुदा बेटियां-बहनें अपने माता-पिता और परिवार का सहारा बनती हैं। शादी के बाद बेटी अपने मायके के परिवार से पूरी तरह अलग हो जाती है, यह एक पुरानी और रूढ़िवादी धारणा है, जिसे संवैधानिक समानता के सिद्धांत के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा- 4 हफ्ते के अंदर आदेश जारी करें हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार के 19 सितंबर 2019 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें विवाहित बहन होने का हवाला देते हुए नौकरी देने से इनकार कर दिया गया था। साथ ही निर्देश दिया कि अनुकंपा नियुक्ति के मामले में 4 हफ्ते के अंदर नियमों के अनुसार पुनर्विचार कर नया और सकारात्मक आदेश जारी किया जाए।