सोशल मीडिया आज के जमाने में हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया है. दोस्त यार, दूर रह हे मां-बाप से जुड़ने का एक ऐसा सिस्टम बना है जिसके बिना अब जिंदगी जीना पड़े तो बहुत मुश्किल होगा. मगर इसी सोशल मीडिया पर एक खबर आई है जो काफी चिंताजनक है. अमेरिका में सोशल मीडिया ऐप स्नैपचैट की पैरेंट कंपनी स्नैप पर आरोप लगा है कि उसकी मदद से एक 25 साल के आरोपी ने 12 साल की बच्ची के साथ रेप किया है. यह घटना अपने आप में काफी बड़ी मानी जा रही है क्योंकि स्नैप का इस्तेमाल भारत में भी धड़ल्ले से होता है. स्टाइक बनाने के चक्कर में लोग अपनी जिंदगी से जुड़े कुछ खास और कुछ सामान्य सी हलचल एक दूसरे को भेजते रहते हैं. ऐसे में यह सवाल उठता है कि सोशल मीडिया बच्चों के लिए कितना सेफ है. कंपनियां सुरक्षा को लेकर इतनी लापरवाह क्यों हैं. अब तक इन पर नकेल कसने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं. आइए इन्हीं सब पहुलओं पर डिटेल में बात करते हैं.
पहले अमेरिका वाला मामला समझ लीजिए. कंपनी पर आरोप है कि स्नैपचैट के क्विक एड और स्नैप मैप जैसे फीचर्स का इस्तेमाल करके आरोपी गैब्रियल जोएल वैलेंटीन-रियोस ने जेएफ नाम की 12 साल की लड़की को अपने जाल में फंसाया. स्नैपचैट अधिकारियों को डार्क वेब पर एक ऐसी किताब मिली, जिसमें बताया गया था कि प्लेटफॉर्म के फीचर्स का इस्तेमाल करके बच्चों और किशोरों को कैसे निशाना बनाया जा सकता है. हीट इनिशिएटिव नाम के संगठन के सर्वे के मुताबिक, नाबालिग यूजर्स में से करीब आधे बच्चों ने पिछले एक साल में स्नैपचैट पर आपत्तिजनक या असुरक्षित कंटेंट और संदेश देखे. वहीं, फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब और स्नैपचैट जैसी बड़ी सोशल मीडिया कंपनियां भी कानूनी मामलों का सामना कर रही हैं. अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य की अदालतों में सोशल मीडिया की लत और उससे होने वाले नुकसान से जुड़े 3,300 से ज्यादा मुकदमे इन कंपनियों के खिलाफ चल रहे हैं.
भारत के लिए कितना संवेदनशील है ये मामला?
स्नैपटैप पर भले ही अमेरिका में आरोप लगे हों मगर यह मामला भारत के लिहाज से भी काफी संवेदशील माना जा रहा है कि अगर यूजर वेस की बात करें तो भारत उनमें सबसे ऊपर है. अमेरिका में जहां 10.6 करोड़ इस ऐप के यूजर हैं तो वहीं, भारत में उसका दोगुना करीब-करीब 20.8 करोड़ यूजर हैं. ऐसे में यह खबर भारत को भी एक चुटकी भर नमक के साथ ही लेनी चाहिए. इस ऐप की शुरुआत साल 2011 में हुई
मुनाफे के लिए काम कर रही हैं काम
नेटफ्लिक्स पर एक ‘द सोशल डिलेमा‘ नाम की फिल्म है, जिसमें इस बात पर पूरा जोर दिया गया है और एक्सपर्ट्स के जरिए बातचीत करते साबित किया गया है कि एल्गोरिदम असल में मुनाफा कमाने के लिए एक अनसेफ माहौल पैदा करते हैं. इसी बात का सपोर्ट कमोवेश The Wall Street Journal की एक लंबी इंवेटिगेशन की सीरीज The Facebook Files भी करती है, जिसमें बताया गया है कि फेसबुक (मेटा) को पता था कि उनका प्लेटफॉर्म बच्चों के लिए हानिकारक है, फिर भी उन्होंने मुनाफे को प्राथमिकता दी. यानी ये कंपनियां अपना मुनाफा कमाने के लिए आम- आदमी के अधिकारों के साथ खिलवाड़ कर रही हैं. इस पर एक The Age of Surveillance Capitalism नाम की किताब भी है, जिसे Shoshana Zuboff ने लिखा है. इस किताब में इस बात पर फोकस किया गया है कि कैसे इन सोशल मीडिया कंपनियों ने लोगों के एक्सपीरियंस को डेटा की तरह इस्तेमाल करके मुनाफा कमाया है और कमाते जा रही हैं.
सोशल मीडिया कंपनियों पर लगातार हो हैं मुकदमें
मेटा (फेसबुक और इंस्टाग्राम)- मेटा पर दुनिया भर में सबसे अधिक मुकदमे दायर किए गए हैं. इन पर बच्चों की सुरक्षा में लापरवाही बरतने, प्लेटफॉर्म के माध्यम से यौन शोषण को बढ़ावा देने, और हानिकारक एल्गोरिदम का उपयोग करने के गंभीर आरोप लगे हैं. अमेरिका में सैकड़ों परिवारों ने मेटा पर मुकदमा दायर किया है, जिसमें यह दावा किया गया है कि उनके प्लेटफॉर्म ने नाबालिगों को यौन शोषण और शोषणकारी स्थितियों के प्रति असुरक्षित छोड़ दिया.
टिकटॉक (TikTok)- टिकटॉक को भी दुनिया भर में सुरक्षा संबंधी मुकदमों का सामना करना पड़ा है. विशेष रूप से बच्चों की निजता और असुरक्षित कंटेंट को लेकर कई देशों में इस पर जांच चल रही है. कुछ मुकदमों में आरोप लगाया गया है कि प्लेटफॉर्म की एल्गोरिदम ऐसी सामग्री दिखाती है जो बच्चों को हानिकारक गतिविधियों और शोषणकारी संपर्कों की ओर धकेल सकती है.
ट्विटर (अब X)- एलन मस्क अधिग्रहण के बाद से, प्लेटफॉर्म पर कंटेंट मॉडरेशन को लेकर काफी विवाद रहा है. बाल सुरक्षा समूहों ने प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) को रोकने में ढिलाई बरतने के आरोप लगाए हैं, जिसके कारण कई देशों में इसे कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
क्यों सोशल मीडिया कंपनियां सुरक्षा के प्रति हैं लापरवाह?
एल्गोरिदम में कैसे छिप गई सुरक्षा
ज्यादा लोग ज्यादा पैसा- इस शहर के मालिक (कंपनियां) जानते हैं कि अगर कोई यूजर प्लेटफॉर्म पर ज्यादा समय बिताएगा, तो वे विज्ञापन से ज्यादा पैसा कमाएंगे. लेकिन समस्या यह है कि इंसानी दिमाग को सबसे ज्यादा ‘उत्तेजक’ (sensational) चीजें पसंद आती हैं. अगर एल्गोरिदम शांति और सुरक्षा को प्राथमिकता देता है, तो यूजर शायद बोर हो जाए. इसलिए, वे अनजाने में ऐसी सामग्री को आगे बढ़ाते हैं जो ध्यान खींचती है, भले ही वह अनैतिक हो.
स्केल बहुत है छोटा- वे एक ऐसी ‘सुरक्षा टीम’ बनाते हैं, लेकिन वह टीम पूरे समुद्र में एक बूंद के समान है. जब तक वे किसी शिकायत पर कार्रवाई करते हैं, तब तक वह हानिकारक सामग्री वायरल होकर लाखों बच्चों तक पहुंच चुकी होती है.
जिम्मेदारी से बचने का कानून- ये कंपनियां ‘इंटरमीडियरी’ के रूप में काम करती हैं. वे कहती हैं, “हम सिर्फ एक सड़क हैं; अगर सड़क पर कोई अपराध होता है, तो सड़क बनाने वाली कंपनी जिम्मेदार नहीं है.” यही तर्क उन्हें लंबे समय तक अरबों डॉलर के जुर्माने से बचाता रहा है. अगर वे सुरक्षा को बहुत ज्यादा सख्त करेंगे, तो प्लेटफॉर्म की ‘मजा’ और ‘तेजी’ खत्म हो जाएगी, जिससे उनके शेयर गिर सकते हैं.
आप खुद सुरक्षित रहने के लिए क्या करें?
डिजिटल दुनिया में सुरक्षित रहने के लिए जागरूकता ही आपका सबसे बड़ा हथियार है. शुरुआत अपनी प्राइवेसी सेटिंग्स को सख्त करके करें और अपनी प्रोफाइल को प्राइवेट रखें ताकि अजनबियों की पहुंच सीमित हो सके. अगर आपके बच्चे की उम्र 18 साल से कम है तो समय-समय पर उसके फोन की निगरानी करते रहें कि वह क्या चला रहा है और क्या देख रहा है. अनजान लोगों के सुझावों से बचने के लिए ‘क्विक ऐड’ जैसे फीचर्स को तुरंत बंद करें और अपनी सुरक्षा के लिए अपनी ‘लाइव लोकेशन’ को केवल भरोसेमंद दोस्तों तक ही सीमित रखें. सतर्क रहना सबसे जरूरी है, इसलिए यदि आपको कोई भी संदिग्ध मैसेज आता है, तो बिना देरी किए उसका स्क्रीनशॉट लें और उसे प्लेटफॉर्म पर रिपोर्ट करें. याद रखें, किसी भी तरह के संदिग्ध व्यवहार को चुपचाप सहने के बजाय, उसे तुरंत संबंधित प्लेटफॉर्म को रिपोर्ट करना ही आपकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का सबसे सही और जिम्मेदार तरीका है.
सोशल मीडिया पर सरकारों ने कसी है नकेल
ऐसा नहीं कि है इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के रवैये पर सरकारें मौन हैं, लेकिन उनके कदम इसके स्केल के हिसाब से अभी नाकाफी मालूम होते हैं. मिसाल के तौर पर यूरोपीय संघ का ‘डिजिटल सर्विसेज एक्ट’ (DSA) हो या भारत के नए IT नियम, अब यह साफ कहा जा रहा है कि सोशल मीडिया कंपनियां सिर्फ एक ‘माध्यम’ नहीं हैं. अगर उनके प्लेटफॉर्म्स के जरिए कोई अपराध होता है तो कंपनियों की जवाबदेही तय होगी. हालांकि, इन सभी मामलों पर इन टेक कंपनियों को अपने एल्गोरिदम में ‘सुरक्षा को प्राथमिकता’ देनी होगी. जब तक कंपनियां सुरक्षा को अपने कोड का हिस्सा नहीं बनाएंगी, तब तक ऐसी घटनाओं की आशंका बनी रहेगी. डिजिटल दुनिया के इस मायाजाल में हमें यह समझने की जरूरत है कि क्या हम एक ऐसी तकनीक का उपयोग कर रहे हैं जो सुरक्षित है, या हम बस मुनाफे वाली मशीन का हिस्सा बन रहे हैं?

