CG NEWS : पार्ट-टाइम जॉब के नाम पर 10.60 लाख की ठगी कोर्ट ने 2 आरोपियों को दोषी ठहराया 7-7 साल की सजा सुनाई 3 बरी…

दुर्ग, 07 अप्रैल (वेदांत समाचर): दुर्ग जिले के द्वितीय अपर सत्र न्यायालय ने टेलीग्राम पर पार्ट टाइम जॉब के नाम पर 10.60 लाख रुपए की साइबर ठगी के मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने दो आरोपियों को दोषी करार देते हुए 7-7 साल की सजा सुनाई है, जबकि तीन को बरी कर दिया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि आधुनिक तकनीक से होने वाले अपराधों में साक्ष्य की प्रकृति भले अलग हो, लेकिन अपराध की गंभीरता कम नहीं होती।

यह मामला 10 लाख 60 हजार 912 रुपए की ऑनलाइन ठगी से जुड़ा है। इसमें पीड़ित को टेलीग्राम के माध्यम से पार्ट टाइम जॉब का झांसा देकर जाल में फंसाया गया था। 25 जून 2025 को शिकायतकर्ता की पत्नी के टेलीग्राम आईडी पर “पार्ट टाइम जॉब” का एक मैसेज आया। इसमें यूट्यूब वीडियो को लाइक और कमेंट करने के बदले पैसे मिलने का लालच दिया गया था।

शुरुआत में आरोपियों ने छोटे-छोटे भुगतान करके पीड़ित का भरोसा जीता। उसे पहले 150 रुपए और फिर कुछ और रकम भेजी गई, जिससे पीड़ित को यह काम वास्तविक लगा। इसके बाद “टास्क” पूरा करने के नाम पर पीड़ित से लगातार बड़ी रकम जमा कराने का सिलसिला शुरू हुआ। यह रकम अलग-अलग यूपीआई आईडी और बैंक खातों के माध्यम से ट्रांसफर कराई गई। न्यायालय के समक्ष पेश साक्ष्यों से यह स्पष्ट हुआ कि आरोपियों ने सुनियोजित तरीके से पीड़ित को पहले लाभ दिखाया और फिर उसे बार-बार बड़ी रकम निवेश करने के लिए प्रेरित किया। पीड़ित से पहले 1,010 रुपए फिर 28,500 रुपए और उसके बाद 78,888 रुपए मांगे गए। इसके बाद लाखों रुपए की मांग की गई। हर बार अकाउंट फ्रीज होने या क्रेडिट स्कोर कम होने जैसे नए बहाने बताकर पैसे वसूले गए।

इस प्रकार, पीड़ित से कुल 10,60,912 रुपए की ठगी की गई, जिसे अलग-अलग बैंक खातों और यूपीआई माध्यमों से ट्रांसफर किया गया था। पीड़ित की शिकायत पर साइबर थाना दुर्ग में केस दर्ज हुआ। जांच में पुलिस ने तकनीकी साक्ष्य, बैंक स्टेटमेंट और डिजिटल ट्रेल से आरोपियों को गिरफ्तार किया। जांच में पता चला कि आरोपी महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश से जुड़े हैं।

जांच में यह पाया गया कि आरोपियों ने फर्जी टेलीग्राम आईडी, बैंक खाते और डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर ठगी की। इसके बाद चार्जशीट न्यायालय में प्रस्तुत हुई। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 9 साक्षियों को पेश किया, जिनमें पीड़ित स्वराज बेनर्जी और पत्नी प्रमुख थे। पीड़ित ने बताया कि शुरू में कुछ पैसे मिले, बाद में लगातार बड़ी रकम की मांग हुई।

अदालत ने डिजिटल अपराध की प्रकृति को देखते हुए पहचान न होने को अपराध नकारने का आधार नहीं माना। बैंक खातों के स्टेटमेंट और लेनदेन रिकॉर्ड महत्वपूर्ण साक्ष्य माने गए, जिससे ठगी की पुष्टि हुई। न्यायालय ने कहा कि साइबर अपराध में प्रत्यक्ष पहचान आवश्यक नहीं। टेलीग्राम और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म की बातचीत, बैंक ट्रांजैक्शन और तकनीकी साक्ष्य पर्याप्त आधार बनते हैं। अदालत ने यह भी माना कि शुरुआती भुगतान देकर भरोसा जीतना इस प्रकार के फ्रॉड का सामान्य पैटर्न है। साक्ष्य के आधार पर सचिन नलगे और हेमंत कुशवाहा को भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 318(4), 336(3) तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66D में दोषी पाया गया। दोनों को 7-7 साल का सश्रम कारावास और जुर्माना सुनाया गया। आईटी एक्ट के तहत अतिरिक्त 3 वर्ष की सजा भी दी गई।

तीन आरोपी रोहित राजेंद्र राउत, साहिल संतोष गोडसे और समीर सुभाष शिंदे साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त हुए। न्यायालय ने कहा कि इनके खिलाफ ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं हुए, इसलिए संदेह का लाभ दिया गया। जांच में आरोपियों के पास से कई मोबाइल फोन, एटीएम कार्ड, बैंक पासबुक, चेकबुक और अन्य दस्तावेज जब्त हुए। सामग्री से संकेत मिला कि आरोपियों ने कई बैंक खातों और डिजिटल उपकरणों का उपयोग कर ठगी का नेटवर्क संचालित किया। सजा के दौरान बचाव पक्ष ने कहा कि पीड़ित को पूरी रकम लौट चुकी है, इसलिए सजा कम हो। अभियोजन ने इसे गंभीर आर्थिक अपराध बताते हुए कड़ी सजा मांगी। न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपराध की गंभीरता और डिजिटल माध्यम से किए गए छल को ध्यान में रखते हुए सख्त सजा सुनाई।