साल बीज से बनेगी चॉकलेट, डोंगानाला में लगेगी 35 लाख की प्रोसेसिंग यूनिट, आदिवासी संग्राहकों की बढ़ेगी आय - vedantsamachar.in

साल बीज से बनेगी चॉकलेट, डोंगानाला में लगेगी 35 लाख की प्रोसेसिंग यूनिट, आदिवासी संग्राहकों की बढ़ेगी आय

कोरबा,28 मई 2026। वन संपदा से समृद्ध कोरबा जिले में अब लघु वनोपज के स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा रहा है। तेंदूपत्ता संग्रहण के बाद अब साल बीज संग्रहण को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। वन विभाग ने कटघोरा वनमंडल के अंतर्गत ग्राम डोंगानाला में साल बीज प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने की योजना बनाई है। करीब 35 लाख रुपये की लागत से लगने वाली इस यूनिट के लिए जिला खनिज न्यास मद (डीएमएफ) से स्वीकृति हेतु प्रस्ताव तैयार कर भेजा गया है। योजना के शुरू होने से वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी और वन आश्रित परिवारों को सीधा आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

कोरबा जिले के जंगलों में साल, महुआ, चार, लाख और तेंदूपत्ता जैसे महत्वपूर्ण लघु वनोपज बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। अब तक इन उत्पादों को ग्रामीणों और संग्राहकों से बेहद कम कीमत पर खरीदकर बाहरी व्यापारी बड़े शहरों और उद्योगों तक पहुंचाते रहे हैं। वहां इनका प्रसंस्करण कर तेल, खाद्य सामग्री और अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं, जिससे व्यापारियों को कई गुना अधिक लाभ मिलता है। वन विभाग अब इस व्यवस्था को बदलते हुए स्थानीय स्तर पर ही प्रोसेसिंग सुविधा विकसित करना चाहता है, ताकि वन उत्पादों का वास्तविक लाभ ग्रामीणों तक पहुंच सके।

जानकारी के अनुसार जिले के दोनों वन मंडलों में हर वर्ष मई-जून के दौरान एक हजार क्विंटल से अधिक साल बीज का संग्रहण किया जाता है। साल बीज से निकाले जाने वाले तेल, जिसे “साल बटर” कहा जाता है, की खाद्य उद्योग में काफी मांग है। इसका उपयोग चॉकलेट, बिस्किट और अन्य खाद्य पदार्थों में वसा के रूप में किया जाता है। इसके अलावा कॉस्मेटिक, साबुन और सौंदर्य उत्पादों के निर्माण में भी साल बटर का उपयोग किया जाता है।

वन विभाग की प्रस्तावित मशीन केवल साल बीज तक सीमित नहीं रहेगी। इसके माध्यम से महुआ फल, जिसे स्थानीय भाषा में डोरी कहा जाता है, से भी तेल निकाला जा सकेगा। वर्तमान में ग्रामीण पारंपरिक पद्धति से डोरी तेल तैयार करते हैं, जिसमें काफी समय और श्रम लगता है। आधुनिक मशीन लगने के बाद यह प्रक्रिया आसान और तेज हो जाएगी। इसके अलावा कोसम और नीम के बीजों से भी तेल निकाला जा सकेगा, जिसका उपयोग औषधीय कार्यों, धार्मिक आयोजनों और दीप प्रज्ज्वलन में किया जाता है।

आदिवासी समुदाय में साल बीज का उपयोग लंबे समय से पारंपरिक खाद्य पदार्थ बनाने में भी होता रहा है। ग्रामीण साल बीज को पीसकर उसका आटा तैयार करते हैं और उससे विभिन्न व्यंजन बनाते हैं। यही कारण है कि साल बीज केवल वनोपज नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा भी माना जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार साल बीज से तेल निकालने के बाद बचने वाली खली भी काफी उपयोगी होती है। इसमें प्रोटीन और स्टार्च की मात्रा अधिक होने के कारण इसका उपयोग पशु और मुर्गी चारे के रूप में किया जाता है। इस तरह एक ही उत्पाद से कई प्रकार के उपयोगी संसाधन तैयार होंगे, जिससे ग्रामीणों की आय में अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकेगी।

वन विभाग का मानना है कि यदि डोंगानाला में प्रस्तावित यह परियोजना सफल रहती है तो भविष्य में जिले के अन्य वन क्षेत्रों में भी इसी तरह की प्रोसेसिंग इकाइयां स्थापित की जा सकती हैं। इससे स्थानीय स्तर पर वनोपज आधारित छोटे उद्योग विकसित होंगे, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और वन क्षेत्रों से होने वाले पलायन में भी कमी आ सकती है।

कटघोरा वन मंडलाधिकारी कुमार निशांत ने बताया कि वनोपज की स्थानीय स्तर पर उपयोगिता बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। डोंगानाला में साल बटर तैयार करने हेतु प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इसके शुरू होने से संग्राहकों को बेहतर कीमत मिलने के साथ आदिवासी समुदाय के लिए स्वरोजगार के नए अवसर भी उपलब्ध होंगे।