सीमा पर तैनात फौजी भाइयों के नाम… चाम्पा की बहन ने भेजा प्यार, राखी के साथ मिट्टी और हरियाली का संदेश... - vedantsamachar.in

सीमा पर तैनात फौजी भाइयों के नाम… चाम्पा की बहन ने भेजा प्यार, राखी के साथ मिट्टी और हरियाली का संदेश…

जांजगीर-चाम्पा,06अगस्त (वेदांत समाचार)। रक्षाबंधन का त्योहार आते ही हर बहन अपने भाई की कलाई पर प्यार का धागा बांधने की तैयारी में जुट जाती है। लेकिन चाम्पा की एक बहन ऐसी भी है, जिसका भाई कोई एक नहीं, बल्कि देश की सीमाओं पर तैनात हजारों सैनिक हैं। जब देशभर में बहनें अपने भाइयों के लिए राखियां चुन रही हैं, तब चाम्पा की नेहा अविनाश अग्रवाल अपने घर में बैठकर मिट्टी, गोबर और बीजों से ऐसी अनोखी राखियां तैयार कर रही हैं, जो सिर्फ रक्षा का वचन नहीं, बल्कि हरियाली का संदेश भी अपने साथ लेकर जाएंगी।

यह कहानी आज से नहीं, बल्कि चार साल पहले शुरू हुई थी। नेहा के मन में एक सवाल उठा कि जो सैनिक हर त्योहार पर अपने परिवार से दूर रहकर देश की रक्षा करते हैं, उनके लिए भी कोई बहन राखी भेजे। बस इसी सोच ने एक छोटे से प्रयास को अभियान का रूप दे दिया। तब से हर रक्षाबंधन पर वह अपने बच्चों और सहेलियों के साथ मिलकर सीमा पर तैनात फौजी भाइयों के लिए विशेष राखियां तैयार करती हैं।

इन राखियों की सबसे खास बात यह है कि इनमें केवल रेशमी धागा नहीं, बल्कि देश की मिट्टी की खुशबू भी शामिल होती है। राखी को गोबर, मिट्टी और विभिन्न पेड़-पौधों व फूलों के बीजों से तैयार किया जाता है। इसे भारत के नक्शे का आकार देकर तिरंगे की पट्टी से सजाया जाता है। राखी के साथ तिलक के लिए अलग से मिट्टी भी भेजी जाती है, ताकि सैनिक जब इसे माथे पर लगाएं तो उन्हें अपनी मातृभूमि और अपनेपन का एहसास हो सके।

मारवाड़ी महिला समिति से जुड़ी नेहा बताती हैं कि सीमा पर तैनात सैनिक हर मौसम में देश की रक्षा करते हैं। कई बार रक्षाबंधन जैसे त्योहार भी वे अपने परिवार से दूर बिताते हैं। ऐसे में यदि किसी अनजान बहन की राखी और शुभकामनाएं उनके पास पहुंचें, तो यह उनके मनोबल को बढ़ाने का छोटा-सा प्रयास है।

नेहा का यह अभियान केवल सैनिकों तक प्रेम पहुंचाने तक सीमित नहीं है। उनकी हर राखी पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है। राखी में नींबू, संतरा, पीपल, बरगद, नीम, तुलसी और गेंदा जैसे पौधों के बीज डाले जाते हैं। रक्षाबंधन के बाद यदि राखी को गमले या मिट्टी में रखकर पानी दिया जाए, तो यही बीज अंकुरित होकर नए पौधों का रूप ले लेते हैं। यानी एक राखी, जो पहले भाई की कलाई की शोभा बनती है, बाद में धरती की हरियाली बढ़ाने का माध्यम बन जाती है।

नेहा बताती हैं कि उनके घर में आने वाले फलों और फूलों के बीज कभी कूड़ेदान में नहीं जाते। वे उन्हें सहेजकर रखती हैं और इन्हीं बीजों से हर साल सैनिक भाइयों के लिए राखियां तैयार करती हैं। उनका मानना है कि छोटे-छोटे प्रयास भी समाज और पर्यावरण में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

रक्षाबंधन के इस पर्व पर चाम्पा से उठी यह पहल केवल एक बहन के प्रेम की कहानी नहीं है, बल्कि यह देशभक्ति, प्रकृति संरक्षण और सामाजिक संवेदनशीलता का ऐसा संदेश है, जो हर किसी को प्रेरित करता है। नेहा की राखियां सिर्फ सैनिकों की कलाई तक नहीं पहुंचतीं, बल्कि उनके साथ मातृभूमि का प्यार, बहन का स्नेह और हरियाली का संकल्प भी लेकर जाती हैं।