आजादी के 77 साल बाद भी सम्मानजनक अंतिम विदाई का इंतज़ार, फर्सवानी में खुले आसमान के नीचे जलती हैं चिताएं - vedantsamachar.in

आजादी के 77 साल बाद भी सम्मानजनक अंतिम विदाई का इंतज़ार, फर्सवानी में खुले आसमान के नीचे जलती हैं चिताएं

बारिश में भीगते शव, तिरपाल के सहारे अंतिम संस्कार… ग्रामीण बोले— “जीते जी संघर्ष किया, अब मरने के बाद भी सम्मान नहीं”

राजेश यादव,सारंगढ़,06 अगस्त (वेदांत समाचार)। विकास, सुशासन और मूलभूत सुविधाओं के तमाम दावों के बीच सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले का फर्सवानी गांव एक ऐसी हकीकत बयां करता है, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर सकती है। यहां आज भी ग्रामीणों को अपने परिजनों का अंतिम संस्कार खुले आसमान के नीचे करना पड़ता है। बरसात के मौसम में चिता को जलाए रखना भी चुनौती बन जाता है। तिरपाल और प्लास्टिक की चादरों के सहारे अंतिम संस्कार करना यहां की मजबूरी है, जबकि परिजन अपनों को खोने के दुख के साथ इस बेबसी को भी झेलते हैं।

गांव के मुख्य तालाब की मेढ़ पर बने अस्थायी स्थल पर वर्षों से अंतिम संस्कार किए जा रहे हैं। बरसात के दिनों में यह स्थान कीचड़ और पानी से भर जाता है। ऐसे में शव को कंधों पर उठाकर लाना, चिता सजाना और अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया पूरी करना बेहद कठिन हो जाता है। कई बार परिजनों और ग्रामीणों को बारिश के बीच चिता को बुझने से बचाने के लिए तिरपाल पकड़कर खड़ा रहना पड़ता है।

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ग्रामीणों का कहना है कि गांव से लगभग दो किलोमीटर दूर एक मुक्तिधाम का निर्माण कराया गया था, लेकिन वहां तक जाने वाला रास्ता दुर्गम है। बरसात में रास्ता इतना खराब हो जाता है कि शव वाहन तो दूर, पैदल शव ले जाना भी मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि अधिकांश परिवार तालाब किनारे ही अंतिम संस्कार करने को मजबूर हैं।

“दर्द सिर्फ बारिश का नहीं, व्यवस्था की बेरुखी का है”

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार पंचायत, जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के समक्ष सर्वसुविधायुक्त मुक्तिधाम की मांग रखी। आवेदन दिए गए, मौखिक शिकायतें भी की गईं, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। उनका कहना है कि अंतिम संस्कार जैसी बुनियादी आवश्यकता के लिए भी यदि लोगों को संघर्ष करना पड़े, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

अब आंदोलन की तैयारी

फर्सवानी के ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द ही गांव के समीप उचित स्थान पर शेड, पहुंच मार्ग और आवश्यक सुविधाओं से युक्त मुक्तिधाम का निर्माण शुरू नहीं किया गया, तो वे कलेक्टोरेट पहुंचकर प्रदर्शन करेंगे। ग्रामीणों ने यह भी कहा कि यदि शासन-प्रशासन उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देता, तो गांव के लोग स्वयं घर-घर से सहयोग राशि जुटाकर मुक्तिधाम निर्माण का प्रयास करेंगे।

सवाल सिर्फ एक गांव का नहीं

फर्सवानी की यह तस्वीर केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि उन ग्रामीण क्षेत्रों की हकीकत है जहां अंतिम संस्कार जैसी मूलभूत व्यवस्था भी आज तक उपलब्ध नहीं हो सकी है। सरकारें विकास के दावे करती हैं, लेकिन जब किसी परिवार को अपने प्रियजन की अंतिम विदाई भी सम्मानपूर्वक नसीब नहीं होती, तब विकास के दावे अधूरे दिखाई देते हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या फर्सवानी के ग्रामीणों को सम्मानजनक अंतिम संस्कार की सुविधा मिलने के लिए भी आंदोलन करना पड़ेगा, या फिर प्रशासन इस मानवीय समस्या को गंभीरता से लेते हुए शीघ्र समाधान करेगा।