कोरबा, 3 जून (विश्व साइकिल दिवस)। सुबह के चार बजते ही जब शहर का अधिकांश हिस्सा नींद में होता है, तब कुछ युवा अपनी साइकिल लेकर सड़कों पर निकल पड़ते हैं। उनका उद्देश्य केवल अख़बार बांटना नहीं, बल्कि अपनी मेहनत से आत्मनिर्भरता की राह बनाना भी है। विश्व साइकिल दिवस के अवसर पर ऐसे ही युवा हॉकरों की कहानी साइकिल और संघर्ष के अनोखे रिश्ते को सामने लाती है।
कोरबा में दीपक पत्रे, ओमकार चंद्रा और विजय देवांगन हर सुबह साइकिल पर अख़बार वितरण का काम करते हैं। पढ़ाई और अन्य जिम्मेदारियों के साथ वे नियमित रूप से शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में अख़बार पहुंचाते हैं। इनके लिए साइकिल केवल एक साधन नहीं, बल्कि रोज़गार, अनुशासन और आत्मविश्वास का प्रतीक बन चुकी है।
सुबह तड़के एजेंसी पहुंचकर अख़बारों का बंडल तैयार करना और फिर तय रूट पर निकल जाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। गर्मी की तेज़ धूप हो, सर्दियों की कड़ाके की ठंड या बारिश का मौसम, इनकी जिम्मेदारी में कोई कमी नहीं आती। कई किलोमीटर तक साइकिल चलाकर वे सैकड़ों घरों तक अख़बार पहुंचाते हैं, ताकि लोगों की सुबह ताज़ा खबरों के साथ शुरू हो सके।
दीपक, ओमकार और विजय बताते हैं कि इस काम से उन्हें अपनी पढ़ाई और व्यक्तिगत जरूरतों के लिए आर्थिक सहयोग मिल जाता है। साथ ही समय की पाबंदी, मेहनत और जिम्मेदारी जैसे गुण भी विकसित होते हैं। उनका मानना है कि साइकिल ने उन्हें न केवल आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि स्वास्थ्य को भी बेहतर रखा है।

आज जब अधिकांश लोग छोटी दूरी तय करने के लिए भी मोटर वाहन का उपयोग करते हैं, तब ये युवा प्रतिदिन साइकिल से कई किलोमीटर का सफर तय कर पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश दे रहे हैं। बिना ईंधन के चलने वाली साइकिल न केवल खर्च बचाती है, बल्कि प्रदूषण को कम करने में भी योगदान देती है।
विश्व साइकिल दिवस पर दीपक पत्रे, ओमकार चंद्रा और विजय देवांगन जैसे युवा हॉकर इस बात का उदाहरण हैं कि मेहनत और लगन के साथ साइकिल केवल परिवहन का साधन नहीं रहती, बल्कि सपनों को मंजिल तक पहुंचाने का माध्यम बन जाती है। उनकी साइकिल के पहिए हर सुबह शहर तक सिर्फ अख़बार नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और आत्मनिर्भरता की प्रेरक कहानी भी पहुंचाते हैं।

