नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को SIR कराने का अधिकार प्राप्त है और इसे आयोग की वैधानिक शक्तियों से बाहर नहीं माना जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया को केवल इस आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जा सकता कि यह नियमित संशोधन प्रक्रिया से अलग है। अदालत ने कहा कि कानून चुनाव आयोग को किसी भी समय विशेष संशोधन करने की अनुमति देता है, बशर्ते उसके पीछे उचित कारण और वैधानिक आधार हो।
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत ने सभी पक्षों की दलीलों, घटनाक्रम और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का विस्तृत अध्ययन किया। उन्होंने कहा कि अदालत के सामने मुख्य रूप से तीन प्रश्न थे— क्या चुनाव आयोग को SIR करने का अधिकार है, क्या यह प्रक्रिया किसी वैध उद्देश्य पर आधारित है, और क्या इसमें अपनाई गई कार्यप्रणाली जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के प्रावधानों के अनुरूप है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विवादित SIR प्रक्रिया ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ और उससे जुड़े नियमों का उल्लंघन नहीं करती, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) के तहत आयोग को दिए गए अधिकारों के अनुरूप है।
अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग ने SIR के दौरान निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई और इसका उद्देश्य मतदाता सूचियों को अधिक सटीक एवं पारदर्शी बनाना था। इसलिए आयोग की कार्यप्रणाली को वैध और संवैधानिक माना जाता है।

