भारतीय राजनीति में एक कहावत बहुत मशहूर है कि देश के प्रधानमंत्री का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। यह बात यूं ही नहीं कही जाती, क्योंकि 80 लोकसभा सीटों वाला यह राज्य देश की सत्ता का मुख्य केंद्र रहा है। आजादी के बाद से देश को मिले 15 प्रधानमंत्रियों में से 9 इसी मिट्टी से निकले हैं। लगभग 24 करोड़ से अधिक की आबादी वाला यह राज्य न केवल भौगोलिक और संसदीय दृष्टि से सबसे बड़ा है, बल्कि सामाजिक और जातीय समीकरणों के मामले में भी सबसे अधिक उलझा हुआ है। यूपी की राजनीति का इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है, जो कभी कांग्रेस के एकछत्र राज से शुरू हुआ था, फिर मंडल-कमंडल के दौर से गुजरा, क्षेत्रीय पार्टियों के उदय को देखा और आज भाजपा के मजबूत दौर का गवाह बन रहा है। गोविंद बैलभ पंत से लेकर योगी आदित्यनाथ तक, इस सफर में मुलायम सिंह यादव, मायावती और नरेंद्र मोदी जैसे दिग्गजों ने इस राज्य को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बनाया है।
आजादी के बाद से लेकर 1980 के दशक के मध्य तक उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरी तरह से कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती थी। गोविंद बल्लभ पंत राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने और उनके बाद चंद्रभानु गुप्ता व देश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी जैसे बड़े नेताओं ने राज्य की कमान संभाली। इस दौर में नारायण दत्त तिवारी कांग्रेस के एक बड़े स्तंभ बनकर उभरे, जो यूपी के साथ-साथ उत्तराखंड के भी मुख्यमंत्री रहे और केंद्र में भी अहम मंत्रालयों को संभाला।
नारायण दत्त तिवारी के ही मुख्यमंत्रित्व काल में साल 1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने आखिरी बार पूर्ण बहुमत हासिल किया था। लेकिन इस दशक के अंत तक कांग्रेस का यह मजबूत किला दरकने लगा और नारायण दत्त तिवारी के बाद कांग्रेस ऐसी बिखरी कि आज तक राज्य की सत्ता में वापसी नहीं कर पाई। कांग्रेस के इस पतन की मुख्य वजह पिछड़े वर्ग के लोगों में आई राजनीतिक चेतना को समझा जा सकता है। यादव, कुर्मी और लोधी जैसे पिछड़े समुदायों को अब अपनी असली राजनीतिक ताकत का अहसास होने लगा था, जिसने राज्य में नए दौर की नींव रखी।
साल 1989 उत्तर प्रदेश की राजनीति के इतिहास में एक ऐसा मोड़ लेकर आया, जिसने सब कुछ बदल दिया। केंद्र की वी.पी. सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का रास्ता साफ कर दिया। इस एक फैसले ने यूपी की राजनीति को सामाजिक न्याय की एक नई दिशा दे दी। इसी माहौल के बीच मुलायम सिंह यादव ने जनता दल के नेतृत्व में राज्य में अपनी पहली सरकार बनाई। उनका मुख्यमंत्री बनना पिछड़े वर्ग के राजनीतिक सशक्तिकरण की शुरुआत थी। इसके बाद साल 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी की स्थापना की, जो आगे चलकर सूबे की सबसे बड़ी क्षेत्रीय ताकत बनी। दूसरी तरफ, कांशीराम के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा दलितों की आवाज बनकर तेजी से उभर रही थी। साल 1993 में सपा और बसपा ने हाथ मिला लिया और इस ऐतिहासिक गठबंधन ने भाजपा को सत्ता में आने से रोक दिया। इस चुनाव में मुलायम सिंह यादव दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने।
इसी मंडल और कमंडल के दौर में भाजपा ने भी अपनी रणनीति बदली और राम मंदिर आंदोलन को अपना मुख्य एजेंडा बनाकर हिंदुत्व की राजनीति को अपनी ताकत बनाया। इस दौर में कल्याण सिंह भाजपा के सबसे बड़े और प्रभावशाली चेहरे के रूप में उभरे। एक प्रखर लोधी नेता के रूप में उन्होंने भाजपा को केवल उच्च जातियों की पार्टी के ठप्पे से बाहर निकाला और पिछड़े वर्गों को पार्टी से जोड़ा। साल 1991 में कल्याण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में भाजपा की पहली सरकार बनी और 1992 के बाबरी विध्वंस के समय वे ही राज्य के मुख्यमंत्री थे। कल्याण सिंह की इस कड़क और हिंदू हृदय सम्राट वाली छवि ने यूपी में भाजपा के जनाधार को बहुत मजबूत किया।
इसके बाद का दौर यूपी की राजनीति में त्रिकोणीय मुकाबले का गवाह बना, जहां सपा, बसपा और भाजपा के बीच सत्ता की शह-मात का खेल चलता रहा। 1990 के दशक में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, जिससे मजबूरन गठबंधनों की सरकारें बनीं। मुलायम सिंह यादव ने इस दौरान अपने यादव और मुस्लिम समीकरण के दम पर मजबूती से राज किया, जो राज्य की आबादी का करीब 24 प्रतिशत हिस्सा थे। दूसरी ओर, मायावती दलित समाज को एकजुट करके सूबे की राजनीति का एक बेहद ताकतवर चेहरा बन चुकी थीं। साल 1995 में वे पहली बार मुख्यमंत्री बनीं और 2007 तक वे चार बार इस पद पर रहीं, भले ही उनकी शुरुआती सरकारें कम समय के लिए थीं।
इसी उठापटक वाले दौर में साल 2000 में राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। एक बेहद कुशल रणनीतिकार और राजपूत चेहरे के रूप में राजनाथ सिंह ने अपनी साफ-सुथरी छवि और अति पिछड़ा और अति दलित आरक्षण नीति के जरिए सामाजिक समीकरणों को संतुलित करने की बड़ी कोशिश की। राजनाथ सिंह का यह नेतृत्व भाजपा के उस कठिन दौर में संगठन को बांधे रखने के लिए बेहद अहम सिद्ध हुआ।
साल 2007 के विधानसभा चुनाव ने यूपी की राजनीति में एक नया इतिहास रचा। मायावती के नेतृत्व में बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग यानी दलितों और ब्राह्मणों के अनोखे मेल के दम पर 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। यह देश के इतिहास में पहली बार था जब किसी दलित नेता की पार्टी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिला था, और मायावती ने मुख्यमंत्री के रूप में अपना पांच साल का कार्यकाल भी पूरा किया। उनके इस कार्यकाल को दलितों के सामाजिक गौरव, पार्कों और स्मारकों के निर्माण और सख्त कानून-व्यवस्था के लिए याद किया जाता है। हालांकि, कार्यकाल के खत्म होते-होते भ्रष्टाचार के आरोपों और जनता की नाराजगी के कारण 2012 में बसपा को सत्ता से हाथ धोना पड़ा।
साल 2012 में सत्ता की चाबी समाजवादी पार्टी के पास आई, जिसने 224 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। मुलायम सिंह यादव ने अपनी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए अपने 38 वर्षीय बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी, जिससे वे राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। अखिलेश यादव ने अपनी सरकार में लैपटॉप वितरण, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे जैसे विकास कार्यों और आधुनिक छवि पर ध्यान दिया। लेकिन उनके कार्यकाल के आखिरी दिनों में यादव परिवार की आपसी कलह सड़क पर आ गई। चाचा शिवपाल यादव और अखिलेश के बीच की यह जंग पार्टी को भारी पड़ी और नतीजतन 2017 के चुनाव में सपा महज 47 सीटों पर सिमट कर रह गई।
साल 2017 में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और हिंदुत्व की प्रचंड लहर पर सवार होकर भाजपा ने 312 सीटें जीतकर विपक्षी दलों को पूरी तरह से साफ कर दिया। पार्टी ने गोरक्षपीठ के महंत और तेजतर्रार नेता योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया। योगी सरकार ने आते ही अपराधियों के खिलाफ बुलडोजर नीति और सख्त एनकाउंटर अभियान चलाकर कानून-व्यवस्था को अपनी सबसे बड़ी पहचान बनाया। जनता ने उनके इस अंदाज को पसंद किया और 2022 में भाजपा दोबारा सत्ता में आई और योगी आदित्यनाथ लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनावों में सपा के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने भाजपा के इस विजय रथ को थोड़ी ब्रेक लगाई, जहां सपा 37 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी और भाजपा 33 सीटों पर आ गई, जिससे मुकाबला एक बार फिर बेहद दिलचस्प हो गया है।
आज की तारीख में भी उत्तर प्रदेश की सियासत पूरी तरह से जातीय और सामाजिक ताने-बाने पर टिकी है। जहां भाजपा उच्च जातियों के साथ-साथ गैर-यादव पिछड़ों और दलितों को अपने साथ बनाए रखने के लिए लगातार नए चेहरों को संगठन में जगह दे रही है, वहीं अखिलेश यादव का पीडीए फॉर्मूला उन्हें कड़ी चुनौती दे रहा है। सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल (एस) जैसे छोटे क्षेत्रीय दल भी इस खेल में अपनी-अपनी जातियों के दम पर अहम भूमिका निभा रहे हैं।
यूपी की राजनीति का अब तक का सफर साफ दिखाता है कि यहां सत्ता पाने के लिए विकास के साथ-साथ नारायण दत्त तिवारी जैसी प्रशासनिक सूझबूझ, कल्याण सिंह जैसा सामाजिक जुड़ाव और राजनाथ सिंह जैसी राजनीतिक परिपक्वता के साथ सामाजिक समीकरणों को साधना कितना जरूरी है। अब सबकी नजरें आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि योगी आदित्यनाथ का जादू बरकरार रहता है या अखिलेश यादव का नया समीकरण सत्ता का तख्तापलट करने में कारगर सिद्ध होता है। लेकिन एक बात पूरी तरह साफ है कि देश की राजनीति को करीब से समझने के लिए उत्तर प्रदेश के सियासी मिजाज को समझना बेहद जरूरी है।

