अंबिकापुर,23 मई (वेदांत समाचार)। मैनपाट क्षेत्र की एक बहू अपनी 90 वर्षीय बुजुर्ग सास को पेंशन के लिए हर महीने कई किलोमीटर पैदल चलकर बैंक ले जाने को मजबूर है। यह दृश्य जमीनी स्तर पर सरकारी योजनाओं और वास्तविकताओं के बीच की खाई को उजागर करता है। ग्राम कुनिया जंगलपारा की रहने वाली सुखमनिया बाई अपनी लाचार सास को पीठ पर बैठाकर पथरीले रास्तों, नदी-नालों और ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों से होते हुए ‘नर्मदापुर सेंट्रल बैंक’ तक लेकर आती हैं।
हर बार यह यात्रा करीब 9 किलोमीटर की होती है, जिसे बहू मजबूरी में अकेले पूरा करती है। बैंक के नियमों के अनुसार पेंशन सत्यापन के लिए वृद्धा का स्वयं उपस्थित होना अनिवार्य है ताकि फिंगरप्रिंट या भौतिक सत्यापन किया जा सके। इसी कारण हर महीने तपती धूप में बहू को अपनी 90 वर्षीय सास को उठाकर इस कठिन यात्रा पर निकलना पड़ता है। एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया, घर-पहुंच सेवा और बुजुर्गों के लिए सुविधाओं के दावे करती है, वहीं मैनपाट का यह वनांचल क्षेत्र प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
क्या ऐसे मामलों में नियमों में ढील नहीं दी जानी चाहिए? क्या बुजुर्गों के लिए वैकल्पिक सत्यापन की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए? यह मामला दिखाता है कि डिजिटल सेवाएँ और सरकारी सुविधाएँ कागजों में तो मौजूद हैं, लेकिन दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में जरूरतमंदों तक समय पर नहीं पहुंच पा रही हैं। सुखमनिया बाई और उनकी सास की यह पीड़ा व्यवस्था के सुधार की मांग करती है।

