Vedant Samachar

इमरजेंसी फंड या हेल्थ इंश्योरेंस, मुसीबत के समय कौन देता है ज्यादा साथ, किसमें है फायदा

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जगह थी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज. विषय था निवेश, बाजार और दौलत बनाना. लेकिन एक सत्र ने चर्चा का रुख बदल दिया. पैसा कमाने से ज्यादा उसे बचाने पर जोर दिया गया। क्योंकि एक मेडिकल इमरजेंसी सालों की कमाई साफ कर सकती है. फिर भी भारत में हेल्थ इंश्योरेंस अभी भी बहुत कम लोगों के पास है. आखिर भारत के हेल्थ इंश्योरेंस सिस्टम में गड़बड़ी कहां है? और क्या लोग बीमा छोड़कर सिर्फ बड़ी बचत के भरोसे रह सकते हैं?

असली समस्या: उम्मीद और हकीकत में फर्क
चोपड़ा के मुताबिक सबसे बड़ी दिक्कत है एक्सपेक्टेशन मिसमैच. यानी जो एजेंट पॉलिसी बेचता है, वही क्लेम सेटल नहीं करता. बेचने वाला बड़े-बड़े वादे करता है क्योंकि उसका फायदा पॉलिसी बेचने में है. लेकिन क्लेम के समय दूसरा विभाग आता है, जिसका मकसद कंपनी का मुनाफा बचाना होता है. उदाहरण के तौर पर, अनलिमिटेड कवर का लालच दिया जाता है, लेकिन क्लेम के समय कमरे के किराए या दूसरी शर्तों पर आपत्ति आ जाती है. इससे ग्राहकों में निराशा बढ़ती है.

बारीक शर्तों का जाल
शिल्पा अरोड़ा ने कहा कि ज्यादातर लोग समझ ही नहीं पाते कि वे क्या खरीद रहे हैं. रूम रेंट कैप, इलाज पर सब-लिमिट, डिडक्टिबल, को-पेमेंट जैसी शर्तें क्लेम की रकम कम कर देती हैं. पॉलिसी का एक पेज का सार (CIS) भी आम आदमी के लिए मुश्किल भाषा में होता है. अस्पतालों में TPAs (थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर) भी कई बार सिर्फ कागजी प्रक्रिया तक सीमित रहते हैं। छोटी-सी गलती पर क्लेम अटक सकता है.

क्या सिर्फ बचत काफी है?
दोनों विशेषज्ञों का साफ जवाब था नहीं. 10 लाख का हेल्थ कवर, 10 लाख की बचत जैसा नहीं होता. बीमा हर साल रीसेट हो जाता है. हालांकि छोटी बीमारियों के लिए बचत काम आ सकती है और बड़े खर्च के लिए सुपर टॉप-अप प्लान लिया जा सकता है. मेट्रो शहरों में कम से कम 10 लाख का बेस कवर और 2550 लाख का सुपर टॉप-अप जरूरी बताया गया.

सही पॉलिसी कैसे चुनें?
रूम रेंट कैप देखें
मॉडर्न ट्रीटमेंट कवर है या नहीं
अस्पताल नेटवर्क चेक करें
क्लेम सेटलमेंट की स्पीड और रिजेक्शन रेट देखें
हेल्थ इंश्योरेंस छोड़ना समझदारी नहीं है, लेकिन खरीदते समय पूरी जानकारी और सावधानी बेहद जरूरी है.

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