।।ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।।
मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाए जाने वाला उत्पन्ना एकादशी व्रत इस वर्ष विशेष महत्व लेकर आ रहा है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति को पिछले जन्मों के पापों से भी मुक्ति प्राप्त हो जाती है। शास्त्रों में कहा गया है कि उत्पन्ना एकादशी व्रत करने वालों को इसकी कथा अवश्य पढ़नी चाहिए, जिससे व्रत का पूर्ण फल मिलता है।
इस वर्ष कब है उत्पन्ना एकादशी?
वैदिक पंचांग के अनुसार—
- एकादशी तिथि प्रारंभ : 15 नवंबर 2025, शनिवार — रात्रि 12:49 बजे
- तिथि समाप्त : 16 नवंबर 2025, रविवार — रात्रि 02:37 बजे
शास्त्रों के अनुसार, जब एकादशी में द्वादशी तिथि का संयोग हो, तब उसी दिन व्रत करने का विधान होता है। इसी कारण इस वर्ष उत्पन्ना एकादशी (महाद्वादशी) का व्रत 16 नवंबर 2025, रविवार को रखा जाएगा।
व्रत पारण का समय
- 17 नवंबर 2025, सोमवार
- प्रातः 06:43 बजे से 08:02 बजे तक
त्रिस्पर्शा एकादशी का दुर्लभ योग
इस वर्ष की उत्पन्ना एकादशी त्रिस्पर्शा एकादशी मानी जाएगी।
जब एकादशी तिथि —
- द्वादशी से पूर्व समाप्त हो जाए,
- और साथ ही द्वादशी व त्रयोदशी दोनों को स्पर्श करे,
तब यह त्रिस्पर्शा एकादशी कहलाती है।
शास्त्रों में वर्णन है कि त्रिस्पर्शा एकादशी भगवान को अत्यंत प्रिय होती है।
कहा गया है— “एक त्रिस्पर्शा एकादशी के उपवास से सहस्त्र एकादशी व्रतों का फल प्राप्त होता है।”
उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा
महाभारत काल में युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि एकादशी तिथि कैसे उत्पन्न हुई और यह देवताओं के लिए क्यों प्रिय है?
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया—
सतयुग में मुर नामक एक उग्र और महाबली दैत्य था, जिसने देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। भयभीत देवता पहले भगवान शिव और फिर भगवान विष्णु के पास सहायता हेतु पहुँचे।
भगवान विष्णु ने दानव मुर से युद्ध किया। दानवों का संहार करते हुए वे बदरिकाश्रम की एक विशाल गुफा में विश्राम हेतु गए। मुर दैत्य गुफा में घुस आया और भगवान विष्णु को सोता देखकर उन्हें मारने का प्रयास करने लगा।
उसी समय भगवान विष्णु के दिव्य तेज से एक अद्भुत, शक्तिशाली, तेजस्विनी कन्या उत्पन्न हुई। उसने मुर दानव को युद्ध में पराजित कर उसका वध कर दिया।
जब भगवान विष्णु जागे और उन्होंने दैत्य को मृत अवस्था में देखा, तो उन्होंने पूछा कि यह किसने मारा?
दैवी कन्या ने विनम्रता से कहा—
“स्वामी! आपके ही तेज से उत्पन्न होकर मैंने आपके शत्रु का वध किया है।”
प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वर मांगने को कहा।
कन्या बोली—
“मैं सभी व्रतों में श्रेष्ठ, पापनाशिनी और भक्तों को सिद्धि देने वाली बनूँ। जो लोग मेरे दिन उपवास करें, उन्हें धन, धर्म और मोक्ष प्राप्त हो।”
भगवान ने वर देते हुए कहा—
“तुम्हारा नाम एकादशी होगा। तुम्हारे व्रत से मनुष्य पापों से मुक्त होकर वैकुण्ठ प्राप्त करेंगे।”
एकादशी का महत्व
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि—
- जो व्यक्ति एकादशी का व्रत करता है, वह वैकुण्ठ लोक जाता है।
- एकादशी का महात्म्य पढ़ने या सुनने से भी सहस्त्र गोदान का पुण्य मिलता है।
- एकादशी जैसा पापनाशक व्रत तीनों लोकों में दूसरा नहीं है।
नाड़ीवैद्य पंडित डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इस वर्ष उत्पन्ना एकादशी का महत्व त्रिस्पर्शा योग के कारण और भी बढ़ गई है।



