मुंबई, 07 जुलाई, 2026: सोनी सब का शो हस्तिनापुर के वीर पांडवों और कौरवों के अनकहे बचपन को सामने लाता है, जहाँ उनके रिश्ते और मूल्य उजागर होते हैं, जिन्होंने हस्तिनापुर को आकार दिया। विवाना सिंह इस शो में गांधारी का किरदार निभा रही हैं, जो अपनी गरिमा, दृढ़ता और भावनात्मक गहराई के लिए जानी जाती हैं। यह प्रतिष्ठित रानी अपनी अटूट निष्ठा और ताकत के लिए प्रसिद्ध है।
इस बातचीत में विवाना ने साझा किया कि किस तरह उन्होंने गांधारी को पर्दे पर जीवंत किया, ब्लाइंडफोल्ड के साथ अभिनय का अनुभव कैसा रहा। इसके साथ ही, उन्होंने युवा कलाकारों के साथ काम करने के सफर और उन शाश्वत मूल्यों के बारे में भी बात की, जिन्हें वे चाहती हैं कि दर्शक इस किरदार से अपने जीवन में अपनाएँ।
- आपको क्या लगता है कि शो दर्शकों के सामने गांधारी का कौन-सा नया दृष्टिकोण पेश करता है?
शो गांधारी को एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण से पेश करता है। वे न्यूक्लियर फैमिली में नहीं रहतीं और उनके बच्चों पर सिर्फ उनका ही नहीं, बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों का भी असर पड़ता है। वे 101 बच्चों की माँ हैं और हर एक पर बराबर ध्यान देने की कोशिश करती हैं। इसके साथ ही, वे पट्टी (ब्लाइंडफोल्ड) बाँधकर रहती हैं और दुनिया को दूसरों की आँखों से देखती हैं। धीरे-धीरे उन्हें एहसास होता है कि उनके बच्चों पर पड़ने वाला हर असर सकारात्मक नहीं है। यह माता-पिता के लिए एक अहम् संदेश है कि हमेशा यह जानना ज़रूरी है कि उनके बच्चे किनके साथ समय बिता रहे हैं चाहे दोस्त हों, रिश्तेदार हों या परिवार के सदस्य। हस्तिनापुर के वीर यह भी प्रदर्शित करता है कि ज़रूरत से ज़्यादा प्यार और लाड़-प्यार भी बच्चे को गलत दिशा में ले जा सकता है। - क्या कोई ऐसा दृश्य या सीक्वेंस था, जिसने आपको गांधारी से खास जुड़ाव महसूस कराया?
मैं हर दिन गांधारी से जुड़ाव महसूस करती हूँ। पट्टी बाँधकर अभिनय करना अब तक मेरे करियर की सबसे बड़ी चुनौती रही है। खासकर भावनात्मक पलों में, अभिनेता अक्सर आँखों के संपर्क से जुड़ते हैं, लेकिन गांधारी के पास यह नहीं है। हर दिन मुझे उसकी भावनाओं, रिश्तों और सोच को समझने की चुनौती मिलती है, मानो मैं उसकी ज़िंदगी जी रही हूँ। कई मायनों में मैं खुद को गांधारी से जोड़ पाती हूँ, क्योंकि ठीक उसकी तरह मैं भी लोगों से घिरी रहती हूँ, लेकिन पट्टी की वजह से उनसे अलग-थलग हो जाती हूँ। उसने इसे पहनने का चुनाव किया और दूसरों पर निर्भर रहना पड़ा और मुझे लगता है कि पूरी तरह किसी और पर निर्भर होना कभी आसान नहीं होता। - गांधारी के रिश्ते धृतराष्ट्र, शकुनि और अपने बेटों के साथ सभी अलग-अलग हैं। इनमें से कौन-सा रिश्ता निभाना आपके लिए सबसे चुनौतीपूर्ण रहा?
मेरे लिए सबसे चुनौतीपूर्ण रिश्ता गांधारी और दुर्योधन का रहा है। एक माँ होने के नाते वे महसूस करती हैं कि उनका बेटा धीरे-धीरे गलत रास्ते पर जा रहा है, लेकिन साथ ही वे उलझन, बेबसी और टूटे दिल का सामना करती हैं। वे चाहती हैं कि उसे धर्म के मार्ग पर ले जाएँ, लेकिन जब वे उसके कामों के बारे में जानती हैं, तो हैरान रह जाती हैं और सोचती हैं कि उसने ये मूल्य कहाँ से सीखे। धृतराष्ट्र के साथ रिश्ता अलग है, क्योंकि वे उसकी असुरक्षाओं को समझती हैं और धैर्य, बुद्धिमत्ता और शांति से उसे मार्गदर्शन देने की कोशिश करती हैं। शकुनि के साथ वे उसकी बातें सुनती हैं, लेकिन कभी उसकी सोच को बढ़ावा नहीं देतीं। हालाँकि, वे दृश्य जहाँ गांधारी दुर्योधन को समझाने और सही रास्ते पर लाने की कोशिश करती हैं, मेरे लिए सबसे भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण रहे हैं। - गांधारी की कौन-सी खूबी ने आपको व्यक्तिगत रूप से प्रेरित किया है?
गांधारी के बारे में मुझे सबसे ज़्यादा प्रेरित करने वाली बात है उनका धर्म और न्याय पर मज़बूत विश्वास। वे मानती हैं कि सही चीज़ हमेशा सबसे पहले आनी चाहिए। यदि उनका अपना बेटा भी गलत है, तो वे मानती हैं कि उसे सज़ा मिलनी चाहिए। सही के साथ खड़े रहने की यह खूबी, चाहे व्यक्तिगत रूप से कितनी भी कठिन क्यों न हो, मुझे सच में बहुत प्रभावित करती है। - पहले आपने पट्टी बाँधकर अभिनय करने की चुनौती के बारे में बात की थी। अब जब आप हफ्तों से इस किरदार के साथ जी रही हैं, तो क्या यह आपके लिए सहज हो गया है या अब भी इसमें सचेत प्रयास की ज़रूरत पड़ती है?
यह कभी सहज नहीं हुआ। हर दिन और हर सीन अब भी एक चुनौती है, क्योंकि मुझे किसी और इंसान का रूप लेना पड़ता है। मुझे उसकी ज़िंदगी जीनी होती है, उसकी भावनाओं को समझना होता है और उसके हावभाव को अपनाना होता है। अभिनेता स्वाभाविक रूप से अपनी आँखों के ज़रिए सह-कलाकारों और दर्शकों से जुड़ते हैं, लेकिन गांधारी के पास यह सुविधा नहीं है। इसलिए मुझे उसकी भावनाओं को अपनी आवाज़, अपने हावभाव और छोटे-छोटे इशारों के ज़रिए व्यक्त करने के नए तरीके खोजने पड़ते हैं। मैं आभारी हूँ कि मुझे इतना चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने का अवसर मिला। हर दिन एक नई चुनौती लेकर आता है और मैं उसे कृतज्ञता के साथ स्वीकार करने की कोशिश करती हूँ। - गांधारी की कहानी आज भी प्रासंगिक है। आप क्या उम्मीद करती हैं कि आज के दर्शक उनकी यात्रा से क्या सीख लेकर जाएँगे?
आजकल हम अक्सर देखते हैं कि माता-पिता अपने फोन में व्यस्त रहते हैं और बच्चे अपने फोन में। इस वजह से उनके बीच बातचीत कम होती है और वह जुड़ाव धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने लगता है। मुझे लगता है कि यह भी एक तरह की पट्टी है, क्योंकि हम सच में एक-दूसरे को देखना और समझना बंद कर देते हैं। माता-पिता के रूप में हमारी बड़ी ज़िम्मेदारी है। बच्चों को सिर्फ अच्छे स्कूल या सुविधाएँ ही नहीं चाहिए, उन्हें हमारा समय, ध्यान और प्यार भी चाहिए। अपने बच्चों के साथ समय बिताइए, उनकी बातें सुनिए, समझिए कि वे क्या महसूस कर रहे हैं। हस्तिनापुर के वीर हमें याद दिलाता है कि बच्चे सिर्फ शब्दों से मूल्य नहीं सीखते, बल्कि हमारे कामों को देखकर सीखते हैं। मैं सच में मानती हूँ कि आज हम उन्हें जो प्यार और मार्गदर्शन देंगे, वही कल उन्हें इंसान बनाएगा।
सोनी सब पर हर सोमवार से शनिवार रात 9:00 बजे हस्तिनापुर के वीर देखना न भूलें।

