कोरबा, 1 जुलाई। पुलिस विभाग में तबादले सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा माने जाते हैं, लेकिन जब किसी अधिकारी की नई पदस्थापना महज 12 घंटे भी नहीं टिक पाए तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठने लगते हैं। कोरबा में नगर कोतवाली थाना प्रभारी की नियुक्ति और फिर कुछ ही घंटों बाद उन्हें हटाकर रक्षित केंद्र भेजने के फैसले ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर नई बहस छेड़ दी है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब शहर लगातार हत्या, नशे और अन्य गंभीर अपराधों को लेकर चर्चा में है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या केवल अधिकारियों के चेहरे बदलने से कानून-व्यवस्था की चुनौतियों का समाधान संभव है, या इसके लिए प्रभावी रणनीति और जवाबदेही की भी आवश्यकता है।
जानकारी के अनुसार, 29 जून को नगर कोतवाली क्षेत्र में दिनदहाड़े हुई हत्या की घटना के बाद पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ तिवारी ने तत्काल कार्रवाई करते हुए तत्कालीन थाना प्रभारी एम.बी. पटेल को हटाकर कटघोरा थाना प्रभारी धर्मनारायण तिवारी को नगर कोतवाली का नया प्रभारी नियुक्त किया। आदेश के बाद 30 जून की सुबह धर्मनारायण तिवारी ने विधिवत पदभार भी ग्रहण कर लिया।
हालांकि, दिन समाप्त होने से पहले ही पुलिस विभाग का एक और आदेश जारी हुआ, जिसमें धर्मनारायण तिवारी को रक्षित केंद्र अटैच कर दिया गया तथा उनकी जगह निरीक्षक प्रमोद डडसेना को नगर कोतवाली का नया थाना प्रभारी नियुक्त कर दिया गया। महज 12 घंटे के भीतर हुए इस घटनाक्रम ने शहर में चर्चाओं का दौर तेज कर दिया।
लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि सुबह लिया गया प्रशासनिक निर्णय शाम तक बदलना पड़ा। यदि पहला फैसला उचित था तो उसे इतनी जल्दी बदलने की आवश्यकता क्यों पड़ी, और यदि दूसरा निर्णय आवश्यक था तो पहला आदेश इतनी जल्दबाजी में क्यों जारी किया गया। हालांकि इस बदलाव के पीछे वास्तविक कारणों को लेकर पुलिस विभाग की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
पुलिस प्रशासन को प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार है, लेकिन ऐसे निर्णयों में स्थिरता और स्पष्टता भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। बार-बार बदलते आदेश न केवल आम जनता के बीच सवाल खड़े करते हैं, बल्कि पुलिस महकमे के भीतर भी अनावश्यक चर्चाओं और कयासों को जन्म देते हैं।
फिलहाल शहर की जनता के लिए सबसे बड़ा मुद्दा यह नहीं है कि नगर कोतवाली की कमान किस अधिकारी के हाथ में है, बल्कि यह है कि अपराधियों में कानून का भय कायम रहे, नशे और संगठित अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगे तथा शहर में कानून-व्यवस्था मजबूत बनी रहे। आखिरकार पुलिस की कार्यकुशलता का आकलन तबादलों की संख्या से नहीं, बल्कि अपराध नियंत्रण, जनता की सुरक्षा और पुलिस के प्रति लोगों के भरोसे से किया जाता है।

