आठवां केंद्रीय वेतन आयोग राज्य सरकारों के साथ बातचीत के आखिरी दौर में है. केंद्र और राज्यों पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को देखते हुए, आयोग ‘फिटमेंट फैक्टर’ के मामले में सावधानी बरत सकता है. हालांकि आयोग ने अभी तक अपनी सिफारिशें फाइनल नहीं की हैं, लेकिन शुरुआती चर्चाओं से संकेत मिलता है कि फिटमेंट फैक्टर 7वें वेतन आयोग द्वारा अपनाए गए 2.57 मल्टीप्लायर के आसपास ही रह सकता है, जबकि कर्मचारी यूनियनें इसे और बढ़ाने की मांग कर रही हैं. फिटमेंट फैक्टर, जो मौजूदा बेसिक पे और पेंशन को गुणा करके नया वेतन स्तर तय करता है, सैलरी रिविजन प्रोसेस का सबसे अहम हिस्सा है.
वित्तीय बोझ का आकलन
चर्चाओं की जानकारी रखने वाले एक सीनियर सरकारी अधिकारी ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि अब यह प्रक्रिया फिटमेंट फैक्टर की संभावित रेंज, राज्य सरकारों के साथ बातचीत और संशोधित वेतन व पेंशन ढांचे के वित्तीय असर के आकलन पर केंद्रित हो रही है. केंद्र और राज्य सरकारों पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ का आकलन अंतिम ढांचा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है. सरकारी कर्मचारियों ने अपनी मांगों में भारी बढ़ोतरी की मांग की है, जिसमें 3.83 का मल्टीप्लायर और 69,000 रुपए की न्यूनतम बेसिक सैलरी शामिल है.
इन राज्यों में हो चुकी हैं बैठकें
मेमोरेंडम जमा करने की प्रक्रिया 15 जून को खत्म हो गई, जिससे कर्मचारी यूनियंस, पेंशनर्स और अन्य स्टेकहोल्डर्स की औपचारिक मांगों का दौर पूरा हो गया. अब आयोग इन मांगों के साथ-साथ राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल) से मिली जानकारी की समीक्षा करेगा. इससे पहले दिल्ली, लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, महाराष्ट्र और अन्य क्षेत्रों में स्टेकहोल्डर्स तक पहुंचने के लिए बैठकें हो चुकी हैं. बाकी बातचीत पूरी होने के बाद, उम्मीद है कि पैनल अपनी रिपोर्ट का ड्राफ्ट तैयार करने से पहले मिली जानकारी को एक साथ समेकित करेगा.
यह रिपोर्ट केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए संशोधित वेतन और पेंशन ढांचा तय करेगी. 7वें वेतन आयोग ने 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया था, जिससे न्यूनतम बेसिक पे 7,000 रुपए से बढ़कर 17,990 रुपए हो गई थी, जबकि केंद्र का राजस्व खर्च 2015-16 के 4.8 फीसदी से बढ़कर 2016-17 में 9.9 फीसदी हो गया था.

