NTPC लारा विस्तार के खिलाफ सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा… – vedantsamachar.in

NTPC लारा विस्तार के खिलाफ सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा…

रायगढ़,20 मई (वेदांत समाचार)। एनटीपीसी लारा परियोजना के प्रस्तावित तीसरे चरण विस्तार को लेकर अब विरोध सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया पर भी स्थानीय और प्रभावित क्षेत्र की जनता खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रही है। फेसबुक, व्हाट्सएप और स्थानीय सोशल प्लेटफॉर्मेंस पर लगातार पोस्ट, वीडियो और टिप्पणियां सामने आ रही हैं, जिनमें बढ़ते प्रदूषण, उड़ती राख और जमीन अधिग्रहण को लेकर तीखे सवाल उठाए जा रहे हैं।

2 जून को होने वाली जनसुनवाई से पहले क्षेत्र का माहौल गर्माता जा रहा है। बताया जा रहा है कि परियोजना विस्तार के लिए करीब 227 हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन की जरूरत पड़ेगी, जबकि तीसरे चरण के शुरू होने के बाद हर साल लगभग 1 करोड़ टन फ्लाई ऐश निकलने की आशंका जताई जा रही है। इसी मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर ‘राख का साम्राज्य’, ‘जहरीली हवा’ और ‘गांव बचाओ’ जैसे शब्द तेजी से वायरल हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पहले से संचालित यूनिटों के कारण आसपास के गांवों में धूल और फ्लाई ऐश की समस्या लगातार बढ़ी है। कई ग्रामीण सोशल मीडिया पर वीडियो साझा कर दावा कर रहे हैं कि खेतों, जल स्रोतों और घरों तक राख की परतें पहुंच रही हैं। लोगों का कहना है कि यदि मौजूदा स्थिति ही नियंत्रित नहीं हो पा रही, तो तीसरे चरण के बाद हालात और भयावह हो सकते हैं।

इधर युवा वर्ग और सामाजिक संगठनों ने भी ऑनलाइन अभियान शुरू कर दिया है। कई पोस्टों में सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर पर्यावरणीय प्रभावों का वास्तविक आकलन सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? वहीं कुछ लोगों ने जनसुनवाई को लेकर पारदर्शिता और प्रभावित ग्रामीणों की सहमति को भी बड़ा मुद्दा बनाया है। कई ग्रामीण सोशल मीडिया पर वीडियो साझा कर दावा कर रहे हैं कि खेतों, जल स्रोतों और घरों तक राख की परतें पहुंच रही हैं। लोगों का कहना है कि यदि मौजूदा स्थिति ही नियंत्रित नहीं हो पा रही, तो तीसरे चरण के बाद हालात और भयावह हो सकते हैं। इधर युवा वर्ग और सामाजिक संगठनों ने भी ऑनलाइन अभियान शुरू कर दिया है। कई पोस्टों में सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर पर्यावरणीय प्रभावों का वास्तविक आकलन सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? वहीं कुछ लोगों ने जनसुनवाई को लेकर पारदर्शिता और प्रभावित ग्रामीणों की सहमति को भी बड़ा मुद्दा बनाया है।