Vedant Samachar

छत्तीसगढ़: हर दिन लापता हो रहीं 30 महिलाएं और बच्चियां, तीन साल में 36 हजार से ज्यादा लापता, बच्चों की गुमशुदगी मामले में देश में छठे स्थान पर

Vedant Samachar
5 Min Read

रायपुर। राज्य में महिलाओं और मासूम बच्चियों की सुरक्षा को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्य में औसतन हर दिन 30 महिलाएं गायब हो रही हैं। इनमें से 10 से 12 नाबालिग बालिकाएं हैं।
आंकड़े बताते हैं कि साल दर साल गुमशुदगी के मामले थमने के बजाय बढ़ते जा रहे हैं, जो पुलिस-प्रशासन और सामाजिक सुरक्षा पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं। वर्ष 2023 से 31 जनवरी 2026 तक प्रदेश से कुल 36,662 महिलाएं और बच्चियां लापता हुई हैं। इनमें से लगभग 7,188 को खोजा नहीं जा सका है। पिछले तीन वर्षों में 10,753 बालिकाएं लापता हुईं, जबकि 11,825 को बहला-फुसलाकर ले जाया गया।

इन जिलों में अधिक घटनाएं सरगुजा, जशपुर, कोरबा, बलरामपुर और बस्तर जैसे सीमावर्ती जिलों में मानव तस्करी की घटनाएं अधिक होती हैं। इन क्षेत्रों में बेरोजगारी और प्रवासन की प्रवृत्ति अधिक होने के कारण तस्कर आसानी से झांसे में लेने में सफल हो जाते हैं। इनमें से अधिकांश पीड़ित नाबालिग हैं, जिन्हें बहला-फुसलाकर दूसरे राज्यों में घरेलू काम, जबरन श्रम या यौन शोषण के लिए ले जाया जाता है।

शादी के नाम पर तस्करी का जाल पुलिस अफसरों के मुताबिक लापता होने वाली महिलाओं में बड़ी संख्या आदिवासी वर्ग की है। अक्सर इन्हें रोजगार के बहाने दूसरे राज्यों में घरेलू काम के लिए भेज दिया जाता है या फिर जबरन शादी के जाल में फंसाकर तस्करी की जाती है। उनका दावा है कि अधिकांश को बरामद कर लिया गया है, लेकिन मूल प्रश्न लापता होने से रोकने का है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पुलिस अपने रिक्त पदों को भरकर गांवों तक खुफिया तंत्र मजबूत नहीं करती, तब तक इन आंकड़ों पर लगाम लगाना मुश्किल है। सरकार को आपरेशन मुस्कान के साथ-साथ प्रिवेंशन नेटवर्क पर काम करने की तत्काल आवश्यकता है। लापता 400 बच्चे अब भी सुराग विहीन बच्चों की गुमशुदगी के मामले में देश में छत्तीसगढ़ छठे स्थान पर है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की मिसिंग चिल्ड्रन रिपोर्ट के अनुसार एक जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच राज्य से 982 बच्चे लापता हुए, जिनमें से 400 का अब तक पता नहीं चल सका है।

चौंकाने वाली बात यह है कि लापता होने वालों में 14-17 वर्ष की लड़कियां सर्वाधिक हैं। विशेषज्ञों ने इसके पीछे मानव तस्करी और बाल श्रम जैसी वजहें बताई हैं। देशभर में बंगाल इस सूची में पहले स्थान पर है। भरोसे और लालच की आड़ में हो रही मानव तस्करी मानव तस्कर अब सीधे अपहरण के बजाय धोखे और विश्वास का जाल बुनकर बच्चों को निशाना बना रहे हैं। तस्करों द्वारा शहरों में अच्छी नौकरी, बेहतर शिक्षा और सुनहरे भविष्य का लालच देकर गरीब परिवारों को ठगा जा रहा है। विशेषकर 14-17 वर्ष की किशोरियों को इंटरनेट मीडिया या प्रेम जाल में फंसाकर देह व्यापार के नरक में धकेला जा रहा है।

मानव तस्करी का बदलता स्वरूप चुनौती भरा मानव तस्करी और बाल मजदूरी को रोकने पिछले तीन दशक से काम कर रहे बचपन बचाओ आंदोलन के पूर्व राज्य समन्वय और नंगे पांव सत्याग्रह के संयोजक राजेश सिंह सिसोदिया का कहना है कि मानव तस्करी प्राचीन दासता का आधुनिक चेहरा है, जो अब आर्थिक विवशता से हटकर यौन शोषण और चकाचौंध के लालच की ओर मुड़ चुका है। आज महिलाएं और बच्चे इसके प्राथमिक शिकार हैं।

विशेषकर राज्य के आदिवासी अंचलों जशपुर,सरगुजा से दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों तक फैला दलालों का मजबूत नेटवर्क एक गंभीर संकट है। प्रशासनिक निष्क्रियता,योजनाओं तक पहुंच का अभाव और परिवारों द्वारा बच्चों को परिसंपत्ति मानना इस आग में घी का काम कर रहा है। बिलासपुर जैसे क्षेत्रों में जागरुकता ही इस कुचक्र को तोड़ने का एकमात्र प्रभावी अस्त्र सिद्ध हुई है।

Share This Article