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Brain stroke: क्या होता है ब्रेन स्ट्रोक, कैसे नई तकनीकें इलाज में बन रही मददगार

ब्रेन स्ट्रोक एक ऐसी स्थिति है जिसमें समय पर इलाज न मिले तो मरीज की मौत हो सकती है. भारत में इसके केस भी काफी आते हैं. हर साल 18 लाख नए मामले दर्ज किए जाते हैं.लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. आज डॉक्टरों के पास ऐसे आधुनिक तरीके हैं जो बीमारी की जल्दी पहचान, तेज़ इलाज और रीहैबिलिटेशन में मदद करते हैं. लेकिन ये जरूरी है कि लोग स्ट्रोक को लेकर जागरूक रहें और इसके लक्षण दिखते ही अस्पताल जरूर जाएं.

ब्रेन स्ट्रोक के मामले में अगर लापरवाही की गई और समय पर इलाज न हुआ तो मरीज की जान बचानी मुश्किल हो जाती है. ऐसे में अगर किसी व्यक्ति को अचानक सिर में तेज दर्द, धुंधला दिखना, चक्कर आना और बोलने या चलने में परेशानी महूसस हो रही है तो ये स्ट्रोक के लक्षण हो सकते हैं. इस स्थिति में अस्पताल जाना चाहिए. इस बारे में श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट में न्यूरोलॉजी विभाग में डायरेक्टर डॉ. राजुल अग्रवाल कहते हैं कि स्ट्रोक के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं होती कि क्या करना है, बल्कि यह होती है कि कब करना है. उन्होंने कहा कि स्ट्रोक के इलाज में हर मिनट की देरी लाखों न्यूरॉन्स के नुकसान का कारण बन सकती है. ऐसे में बेहतर इलाज जरूरी होता है.

क्यों होता है ब्रेन स्ट्रोक
स्ट्रोक आने के कई कारण होते हैं, जैसे की ब्लड प्रेशर का ज्यादा रहना (हाइपरटेंशन). अगर किसी व्यक्ति का बीपी हमेशा बढ़ा रहता है तो उसको स्ट्रोक का रिस्क हमेशा रहता है. इसी तरह हाई कोलेस्ट्रॉल भी इसका कारण बन सकता है. स्ट्रोक तक होता है तब ब्रेन की नसों में कोई रूकावट आती है या अचानक नस फट जाती है. कुछ लोगों में इसका रिस्क सामान्य लोगों की तुलना में ज्यादा रहता है. अगर कोई व्यक्ति अधिक धूम्रपान करता है तो उसको भी स्ट्रोक आने का खतरा होता है.

इलाज में आ गई हैं कई नई तकनीकें
डॉ. मुकुंद अग्रवाल, एसोसिएट कंसल्टेंट (एमडी-पीडियाट्रिक्स, डीएम-न्यूरोलॉजी), रीजेंसी हॉस्पिटल, गोरखपुर कहते हैं कि डॉक्टर की समझ और अनुभव हमेशा महत्वपूर्ण रहते हैं, लेकिन आज की तकनीक ने हमें बहुत मदद दी है. अगर किसी मरीज में बड़ी मस्तिष्क की नस ब्लॉक होने का शक होता है, तो आधुनिक टेस्ट और मशीनें हमें तुरंत यह दिखा सकती हैं कि मस्तिष्क का कौन सा हिस्सा प्रभावित हुआ है, कौन सा हिस्सा सुरक्षित है और कहाँ रक्तस्राव का खतरा हो सकता है. इससे डॉक्टर जल्दी और सही निर्णय ले सकते हैं, खासकर ऐसे मामलों में जहाँ देरी मस्तिष्क की कोशिकाओं को स्थायी नुकसान पहुँचा सकती है.

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