मुंबई, 13 फरवरी 2026। पिछले एक दशक में नंदिता रॉय और शिबोप्रसाद मुखर्जी ने बंगाली सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे समय में जब क्षेत्रीय फिल्में देश के मल्टीप्लेक्स नेटवर्क में स्थायी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही थीं, उनके बैनर विंडोज़ प्रोडक्शन ने निरंतर और भरोसेमंद कंटेंट के दम पर प्रमुख राष्ट्रीय मल्टीप्लेक्स चेन में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।
पिछले वर्षों में उनकी फिल्मों ने संयुक्त रूप से लगभग 30.39 करोड़ रुपये का कारोबार किया। इस सफलता में प्रमुख रूप से प्रक्तान, पोस्तो, हामी, बेलाशुरु, रक्तबीज और बोहुरूपी जैसी फिल्मों का बड़ा योगदान रहा। इन फिल्मों ने सिर्फ त्योहार रिलीज़ का लाभ नहीं उठाया, बल्कि लंबी अवधि तक सिनेमाघरों में टिककर बार-बार दर्शकों को आकर्षित किया और पारंपरिक क्षेत्रीय बाज़ार से बाहर भी अपनी स्वीकार्यता बनाई।
इनकी फिल्मों की खासियत मजबूत कहानी, पारिवारिक और सामाजिक सरोकारों से जुड़ा विषय तथा सार्वभौमिक भावनाओं का संतुलन रहा है। स्थानीय जड़ों से जुड़ी कथाओं को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने की उनकी शैली ने बंगाली सिनेमा को नई पहुंच दी। निर्माता और कहानीकार के रूप में दोनों ने प्रदर्शकों और दर्शकों के बीच भरोसे का मजबूत आधार तैयार किया है।
फिल्म विशेषज्ञों के अनुसार इस जोड़ी ने यह साबित किया है कि यदि कंटेंट सशक्त और भावनात्मक रूप से जुड़ा हो तो भाषा बाधा नहीं बनती। क्षेत्रीय सिनेमा भी राष्ट्रीय स्तर पर व्यावसायिक रूप से सफल हो सकता है।
अब विंडोज़ प्रोडक्शन अपने 25 वर्ष पूरे करने की ओर बढ़ रहा है और इसकी यात्रा क्षेत्रीय सिनेमा के हाशिए से मुख्यधारा तक पहुंचने की एक मजबूत मिसाल मानी जा रही है — जहां हर फिल्म, हर शुक्रवार और हर भरा हुआ मल्टीप्लेक्स इस बदलाव की कहानी कहता है।
