Vedant Samachar

हैदराबाद में दर्दनाक हादसा: चींटियों के डर से जूझ रही 25 वर्षीय महिला ने की आत्महत्या…

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हैदराबाद,07नवंबर : हैदराबाद से एक बेहद दुखद और असामान्य मामला सामने आया है, जहां एक 25 वर्षीय महिला ने चींटियों के डर (Myrmecophobia) के कारण आत्महत्या कर ली। इस घटना ने न केवल स्थानीय लोगों को स्तब्ध कर दिया, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के गंभीर मुद्दों पर एक बार फिर चर्चा तेज कर दी है।

मृतका की पहचान मनीषा के रूप में हुई है, जो अमीनपुर इलाके में अपने पति और तीन साल की बेटी के साथ रहती थी। परिवार के अनुसार, मनीषा कई वर्षों से माइरमेकोफोबिया यानी चींटियों के अत्यधिक भय से पीड़ित थी। घर में छोटी-सी चींटी भी देख लेने पर वह दहशत में आ जाती थी और कई बार पैनिक अटैक जैसी स्थिति बन जाती थी। यह भय धीरे-धीरे उसके सामान्य जीवन को प्रभावित करने लगा था।

घटनाक्रम के अनुसार, मंगलवार शाम मनीषा के पति श्रीकांत काम से घर लौटे तो उन्होंने दरवाज़ा अंदर से बंद पाया। काफी देर तक आवाज़ देने के बाद भी प्रतिक्रिया न मिलने पर उन्होंने पड़ोसियों की मदद से दरवाज़ा तोड़ा। अंदर उन्होंने देखा कि मनीषा ने साड़ी से फांसी लगाकर अपनी जान दे दी है। श्रीकांत ने तुरंत पुलिस को सूचना दी।

तेलंगाना टुडे में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, मनीषा ने सुसाइड नोट में लिखा कि वह अब इस डर और तनाव के साथ नहीं जी सकती। नोट में उसने अपनी तीन वर्षीय बेटी की जिम्मेदारी पति को सौंपी। पुलिस ने बताया कि सुसाइड नोट में उसकी मानसिक पीड़ा और अकेलेपन का दर्द साफ झलकता है।

अमीनपुर पुलिस ने मनीषा के माता-पिता की शिकायत पर मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि प्रारंभिक जांच में यह स्पष्ट है कि मनीषा लंबे समय से मानसिक तनाव से जूझ रही थी और उसका इलाज भी चल रहा था। यह भी जांच का विषय है कि कहीं कोई सामाजिक या घरेलू दबाव इस स्थिति को और गंभीर तो नहीं बना रहा था।

क्या है माइरमेकोफोबिया?
विशेषज्ञों के अनुसार माइरमेकोफोबिया एक विशिष्ट फोबिया है, जिसमें व्यक्ति को चींटियों से असामान्य और अत्यधिक भय होता है। कई मामलों में सिर्फ चींटी देखने से ही नहीं, बल्कि उसके खयाल मात्र से भी घबराहट, पसीना, तेज धड़कन, अनिद्रा, बेचैनी और अवसाद जैसी समस्याएं हो सकती हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे फोबिया इलाज-योग्य होते हैं, लेकिन परिवार का सहयोग और सही समय पर थेरेपी बेहद जरूरी होती है।

मनोचिकित्सकों का मानना है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अभी भी जागरूकता की कमी है। फोबिया जैसे रोगों को अक्सर हल्के में लिया जाता है, जबकि यह व्यक्ति की दिनचर्या और जीवन की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

इस पूरे मामले का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि मनीषा की तीन साल की बेटी अब अपनी मां के बिना बड़ी होगी। फिलहाल बच्ची पिता और अन्य परिजनों की देखरेख में है।

यह घटना समाज के लिए एक चेतावनी है कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को कभी भी छोटा या सामान्य मानकर नज़रअंदाज़ न किया जाए। फोबिया, अवसाद और चिंता जैसी समस्याएं उपचार योग्य हैं, लेकिन इसके लिए समय पर सहायता, समझ और संवेदनशीलता अत्यंत आवश्यक है।

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