Vedant Samachar

8 करोड़ की प्रॉपर्टी बेचकर भी नहीं भरा टैक्स, ऐसे दिया Income Tax विभाग को मात

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एक व्यक्ति दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में अपने परिवार की पैतृक कृषि भूमि का हिस्सेदार था. इस जमीन को लगभग 48 करोड़ रुपए में बेचा गया. उस सौदे में उसे लगभग 8 करोड़ रुपए मिले. लेकिन, उस व्यक्ति ने इस आय को अपनी व्यक्तिगत रिटर्न (ITR) में दाखिल नहीं किया. इसके कारण टैक्स विभाग ने कार्रवाई की और उसे नोटिस भेजे गए.

टैक्स विभाग ने पहले धारा 148 के तहत नोटिस जारी किया. फिर जब व्यक्ति ने रिटर्न नहीं दिया तो धारा 142(1) के तहत दो लाइन में नोटिस आए. दूसरे नोटिस के बाद व्यक्ति ने 11 फरवरी 2015 को रिटर्न दाखिल किया. इसके बाद AO (आकलन अधिकारी) ने धारा 143(2) के तहत प्रश्नावली भेजीऔर 27 फरवरी 2015 को धारा 143(3)/147 के तहत मूल्यांकन आदेश जारी कर दिया गया.

ITAT दिल्ली पहुंचा मामला
आकलन अधिकारी का मानना था कि यह लाभ व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत हैसियत में आया है. उन्होंने उस व्यक्ति के हाथों में लगभग ₹ 8.89 करोड़ की दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (LTCG) की आय जोड़ी और ₹75,000 को कृषि आय के रूप में जोड़ा गया जिसे उन्होंने अघोषित माना. उस व्यक्ति ने इस आदेश के खिलाफ अपील की, पर पहले Commissioner of Income Tax (Appeals) ने 17 फरवरी 2016 को अपील खारिज कर दी.

फिर मामला Income Tax Appellate Tribunal, Delhi Bench (ITAT दिल्ली) पहुंचा जहां 18 अगस्त 2025 को उस व्यक्ति को जीत मिली. न्यायाधिकरण ने पाया कि इस पैतृक भूमि का स्वामित्व वास्तव में हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के नाम पर था न कि उस व्यक्ति के व्यक्तिगत नाम पर.

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आसान भाषा में समझिए क्या हुआ
यह जमीन कई पीढ़ियों से परिवार के पास थी. हिंदू कानून के तहत, जब तक इसे अलग से विभाजित नहीं किया गया होता, यह संपत्ति ‘अविभाजित संयुक्त परिवार’ की ही मानी जाती है. उस बिक्री से जो पैसा मिला वह HUF के वित्तीय अभिलेखों में दिखा और इसका ऐसा कोई प्रमाण नहीं था कि व्यक्ति ने पूरी राशि व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल की हो. इसलिए ITAT ने कहा कि यह आय HUF की आय थी, व्यक्ति की नहीं.

HUF की जिम्मेदारी
एक ही लेन-देने पर पहले HUF और फिर व्यक्ति के हाथ में कर लगाना दोहरा कराधान बनाता है, जो कानूनन ठीक नहीं है. इसलिए ITAT ने व्यक्ति के हाथों में कर लगाने वाले आदेश को गलत माना. हालांकि, ₹75,000 की कृषि आय को अघोषित मानने का हिस्सा खारिज नहीं हुआ क्योंकि उस व्यक्ति ने उस हिस्से का पर्याप्त प्रमाण नहीं दिया था. इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि अगर जमीन पैतृक है और विभाजन हीं हुआ है, तो उसकी बिक्री से होने वाला लाभ व्यक्ति के हाथ नहीं बल्कि HUF के हाथ माना जा सकता है.

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