Vedant Samachar

असरानी की अनसुनी-अनकही कहानी, जब चला ‘मुरारी’ होरी बनने

Vedant Samachar
8 Min Read

मुंबई : असरानी की यह कहानी तब की है जब वे अंग्रेजों के ज़माने का जेलर बनकर बच्चे-बच्चों के बीच भी अत्यंत लोकप्रिय हो चुके थे. मेरे अपने, परिचय, अभिमान, मिली और खुशबू जैसी फिल्मों में दिग्गज अभिनेताओं के साथ चरित्र भूमिकाएं निभाकर प्रतिष्ठा हासिल कर चुके थे. उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी और गुलज़ार जैसे दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया था. उन्हें बतौर कॉमेडी एक्टर का तमगा खासतौर पर शोले फिल्म के बाद मिला था. उनकी लोकप्रियता और मांग उन्हें खूब उत्साहित कर रही थी. अब असरानी बतौर एक्टर बनकर आना चाहते थे. लेकिन धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, जितेंद्र, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा और ऋषि कपूर जैसे कलाकारों के आगे यह बहुत आसान नहीं था. लिहाजा उन्होंने खुद निर्देशक बनने की ठानी और खुद को हीरो भी बनाया.

बतौर निर्देशक और मुख्य अभिनेता असरानी की फिल्म थी- चला मुरारी हीरो बनने. यह सन् 1977 में आई थी. इसे असरानी ने खुद ही लिखा भी था. दरअसल शोले, दीवार जैसी कुछ ऐसी फिल्में थीं, जिन्हें देखने के बाद देश भर के बहुत सारे नौजवानों ने हीरो बनने के लिए मुंबई का रुख किया था. एक लहर-सी देखी गई थी. चला मुरारी हीरो बनने में असरानी ने अपने किरदार में इस लहर को आत्मसात किया. वहीं आपातकाल के दौरान और उसके बाद फिल्मों का मिजाज बदलने लगा था. कहीं सिस्टम निशाने पर होता तो कहीं रोमांटिसिज्म का जोर. इस फिल्म में सिस्टम और रोमांटिसिज्म दोनों ही थे. सिस्टम फिल्म इंडस्ट्री का और रोमांटिसिज्म सपनों को साकार करने का.

असरानी के स्ट्रगल की कहानी
चला मुरारी हीरो बनने में उनके अलावा एके हंगल, बिंदिया गोस्वामी और सत्येन कप्पू जैसे कलाकार थे. इतनी सोच-विचार करके बनाई गई यह फिल्म हालांकि बॉक्स ऑफिस पर बहुत कामयाब नहीं हो पाई. मूल रूप से यह कॉमेडी ड्रामा ज़ॉनर की फिल्म थी. कहानी में जिस तरह से मुरारी को हीरो बनने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं, उसी तरह काफी मेहनत करने पर भी असरानी को हीरो वाली मान्यता नहीं मिल सकी. ना तो इंडस्ट्री में किसी ने नोटिस किया और ना ही पब्लिक ने स्वीकारा. वह हंसने-हंसाने वाले या हीरो के सहयोगी कलाकार के तौर पर ही जाने पहचाने गए.

लेकिन चला मुरारी हीरो बनने के हास्य बोध में असरानी ने देश के लाखों नौजवानों की उम्मीदों और सपनों को जैसे कुरेद दिया था. यह फिल्म उस ज़माने में नहीं चली लेकिन बाद के दौर में खूब सराही गई. यह असरानी की एक क्लासिक पेशकश थी. असरानी खुद एक संघर्षशील अभिनेता रहे हैं. जयपुर से मुंबई सपने साकार करने गए. उनका पूरा नाम गोवर्धन असरानी था. लेकिन अपने उपनाम से विख्यात हुए. जयपुर में पहले आकाशवाणी के लिए काम करते थे. आवाज अच्छी थी. अंदाज में आकर्षण था. दिखने में भी हैंडसम थे. लिहाजा एक संघर्षशील अभिनेता को दुख और परेशानियों को कितना सहना पड़ता है, उसे उन्होंने जीकर महसूस किया था.

फिल्म में बाहरी स्ट्रगलर का दर्द भी
जब अपनी कहानी के जरिए मुंबई में बाहर से आए एक स्ट्रगलर का दर्द बताने की बारी आई तो उन्होंने अपने दिल की बातें खुल कर कहीं. और डंके की चोट पर कही. बाहरी कलाकार और इंडस्ट्री के अंदर स्टार किड होने में क्या फर्क है, किसे और कैसे फिल्मों में काम करने का मौका मिलता है, इसे दिखाने के लिए उन्होंने तब के सबसे चार्मिंग एक्टर ऋषि कपूर से बतौर गेस्ट एक्टर काम लिया. अव्वल ये कि ऋषि कपूर ने वह रोल करने से इनकार भी नहीं किया.

चला मुरारी हीरो बनने में ऋषि कपूर वाले उस गेस्ट सीन का खासतौर पर उल्लेख करना चाहूंगा. फिल्म की कहानी में एक जगह मुरारी (असरानी) और उसके साथी को पता चलता है कि बॉबी के पॉपुलर एक्टर ऋषि कपूर नजदीक के किसी सिनेमा हॉल में अपनी फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में आए हैं. मुरारी वहां दौड़कर जाता है. वह ऋषि कपूर को देखना चाहता है. ऋषि कपूर के पास जाता है, उससे मिलता है. अपना परिचय बताता है कि वह भी एक्टिंग करने मुंबई आए हैं. स्ट्रगल कर रहे हैं.

ऋषि कपूर गेस्ट रोल में दिखे थे
ऋषि कपूर पहले तो उन सभी स्ट्रगलर्स को नीचे से ऊपर तक देखते हैं. हल्की मुस्कान चेहरे पर बिखेरते हैं और फिर कहते हैं- अच्छा, तो आप लोग कलाकार हैं. यह सीन स्टार बनाम अभिनेता के द्वंद्व पर तीखा तंज था. और यह काम असरानी जैसे अभिनेता अपनी निर्देशित फिल्म में करते हैं. गौरतलब है कि ऋषि कपूर अपने समय में सबसे लोकप्रिय नेपो किड थे. उन्हें यह गेस्ट रोल करने में कोई गुरेज नहीं था.

ऋषि कपूर के अलावा धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, अमिताभ बच्चन, नीतू सिंह, सुनील दत्त, किशोर कुमार जैसे कई और कलाकार इसमें मेहमान की भूमिका में हैं. फिल्म का अंत उस रोचक नोट से होता है जब मुंबई में एक और मुरारी दाखिल होता है. वहीं इसकी शुरुआत भी बतौर सूत्रधार अशोक कुमार से होती हैं. वह सिनेमा हॉल के अंदर पर्दे के बाहर चेयर पर बैठकर दर्शकों से मुखातिब हैं.

सपनों की गठरी लिये नौजवान
अशोक कुमार कहते हैं- ये जो फिल्म है, ये हम सबकी इच्छाओं, सपनों और भावनाओं की जीती जागती तस्वीर है. सपनों की गठरी बांधकर हर नौजवान मुंबई आता है कुछ बनने के लिए. ये एक ऐसे ही नौजवान की कहानी है. इसी के साथ अगले कट में सड़क पर असरानी एक्टर की तरह गाना गा रहे हैं- खोया खोया चांद खुला आसमां…आंखों में सारी रात जाएगी… तभी वहां एक हवलदार उसे रोकता है. वह कहता है- पहचाना नहीं हवलदार साहेब. दिल्ली का बच्चा-बच्चा जानता है- मैं हूं हीरो.

वास्तव में असरानी के भीतर सिनेमा का कैसा जुनून था, इस फिल्म से जाहिर होता है. कहानी पूरी तरह से फिल्मी थी. यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर पैसे नहीं कमा सकी. लेकिन इससे असरानी का हौसला नहीं टूटा. उन्होंने बाद के दौर में भी निर्देशन का दायित्व निभाया. दो साल बाद 1979 में सलाम मेमसाब बनाई जिसमें एक बार खुद हीरो बने. इस बार हीरोइन थीं- जरीना बहाव. हालांकि यह फिल्म भी नहीं चली. इसके बाद भी फिल्म बनाते रहे. कुछ कॉमेडी फिल्में बनाईं तो कुछ सामान्य सोशल ड्रामा भी. उनकी अन्य निर्देशित फिल्में हैं- 1980 में हम नहीं सुधरेंगे, 1992 में दिल ही तो है और 1997 में उड़ान. उन्होंने अपनी इन फिल्मों में रेखा, डैनी, जैकी श्रॉफ जैसे कलाकारों से भी अभिनय कराया था.

Share This Article