भारतीय रुपये में गुरुवार को रिकॉर्ड गिरावट देखने को मिली. भारतीय करेंसी 88.45 रुपये प्रति डॉलर तक गिर गई. अमेरिकी की ओर से लगाए गए टैरिफ को इसकी सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है. हालांकि, टैरिफ के अलावा कई ऐसे कारण हैं, जो रुपये पर दबाव बना रहे हैं. यहां जानेंगे क्या आने वाले दिनों में भी रुपये में इस तरह की गिरावट जारी रहेगी और वो कौन से कारण हैं, जिसने रुपये को अपने सबसे निचले स्तर तक पहुंचा दिया.
क्या आगे भी जारी रहेगी गिरावट
वैश्विक दबाव के बावजूद विश्लेषक मानते हैं कि रुपये में अब ज्यादा गिरावट की संभावना नहीं है. उनका मानना है कि अगस्त और सितंबर में आई तेज गिरावट ने रुपये को ‘ओवरसोल्ड’ जोन में धकेल दिया है, लेकिन वापसी की गुंजाइश है. क्योंकि डॉलर के मुकाबले रुपये की यह गिरावट अमेरिका की टैरिफ पॉलिसी से जुड़ी है. जिसमें आगे बदलाव की उम्मीद है. इसके अलावा भारत की बुनियादी आर्थिक स्थिति मजबूत है. सरकार की ओर से हाल ही में की गई GST दरों में कटौती से भी मार्केट का सेंटीमेंट पॉजिटिव है. जिससे आगे सुधार की उम्मीद है.
क्या चिंता की बात है रिकॉर्ड लो?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि रुपये की हाल की कमजोरी चिंता का कारण नहीं है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति मजबूत है. यह गिरावट “सिर्फ भावनात्मक” है, न कि भारत की आर्थिक सेहत की असली तस्वीर है. इसके अलावा RBI का हस्तक्षेप करके उतार-चढ़ाव को सीमित कर रहा है. वैश्विक स्तर पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियां डॉलर को और कमजोर कर सकती हैं. ऐसे में डॉलर-रुपया 88 से ऊपर लंबे समय तक टिके रहने की संभावना कम है. इसके बजाय 86.588 के दायरे में स्थिरता ज्यादा संभव है, जब तक कोई नया टैरिफ विवाद या भू-राजनीतिक संकट न हो.
अब जानते हैं वो 5 कारण, जिससे दबाव में आया रुपया
- विदेशी निवेशकों की बिकवाली
विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) की लगातार बिकवाली की वजह से रुपये पर दबाव बना हुआ है. निवेशक जुलाई से भारतीय शेयर बाजार में जोरदार बिकवाली कर रहे हैं. मौजूदा साल में निवेशक भारतीय बाजार से 1.38 लाख करोड़ निकाल चुके हैं. अकेले सितंबर में 7400 करोड़ की निकासी हुई है. - कच्चे तेल की कीमतें
दुनियाभर में जारी अस्थिरता के बीच कच्चे तेल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी से भी रुपया दबाव में आया है. बुधवार को तेल की कीमतों में प्रति बैरल 1 डॉलर से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई. भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है. भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता है. तेल महंगा होने पर डॉलर में ज्यादा भुगतान करना पड़ता है. रुपया दबाव में आता है. - टैरिफ
डॉलर के मुकाबले गिरते भारतीय रुपये पर अमेरिकी टैरिफ का असर भी है. ट्रंप सरकार ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया है. इससे निर्यात घटने संभावना बढ़ गई है. निर्यात घटने से भारत को मिलने वाले डॉलर कम हो जाते हैं. यानी डॉलर की कमी होना रुपया को कमजोर बनाता है. - जियोपॉलिटिकल टेंशन
दुनियाभर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भी निवेशकों के सेटींमेंट्स को प्रभावित किया है. भारत के पड़ोसी देश नेपाल में Gen-Z क्रांति, जापान और फ्रांस में तनाव बढ़ा है. इधर, रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने की कोशिशें नाकाम रही हैं. जियोपॉलिटिकल टेंशन देशों की मुद्रा को प्रभावित करती है. निवेशक सुरक्षित निवेश की तलाश में रहते हैं. - ट्रेड डेफिसिट
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2025 में भारत का व्यापार घाटा लगभग 26.1 अरब डॉलर रहा. ट्रेड डेफिसिट बढ़ने का मतलब है आयात निर्यात से ज्यादा हो गया है. यानी देश को और ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ रही है. ज्यादा डॉलर की मांग रहेगी. रुपये पर दबाव आएगा.



