भाटापारा,07 सितम्बर (वेदांत समाचार) : भाटापारा श्री आदिनाथ नवग्रह पंच बाल्याती दिगंबर जैन मंदिर में पर्युषण पर्व का दसवां दिवस धूमधाम से मनाया गया। आज उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म है। सर्वप्रथम श्री वासुपूज्य भगवान की प्रतिमा मस्तक पर विराजमान कर अभिषेक मोदी, संदीप जैन ने पाण्डुक शिला में विराजमान की, उसके बाद मंगल अभिषेक प्रारंभ हुआ।
आज की शांतिधारा का सौभाग्य संदीप, सनत कुमार, गुंजन, शौर्य, खुशी जैन परिवार, अभिषेक, नेहा, आर्नव, अनायशा मोदी परिवार को प्राप्त हुआ। शांतिधारा के पश्चात भगवान की मंगल आरती की गई – सुरपति ले अपने शीश जगत के… की धुन पर सभी ने भक्ति भाव से नृत्य करते हुए भगवान की आरती संपन्न की। आरती के पश्चात जी की प्रतिमा बेदी पर विराजमान की गई और पर्युषण पर्व की पूजा प्रारंभ हुई। आज नवदेवता पूजा, सोलह कारण पूजा, दश लक्षण पूजा, रत्नत्रय पूजा, अनंत चतुर्दशी पूजा, 24 तीर्थंकरों का अर्ध्य, आचार्य विद्यासागर जी, मुनि चिन्मय सागर जी की पूजा संपन्न हुई। धर्मसभा को संबोधित करते हुए अभिषेक मोदी ने बताया – धर्म का दसवां लक्षण है उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म। जिसमें बताया गया कि हमारा कुछ भी नहीं है, जितने भी विश्व के पदार्थ हैं वे मुझसे पृथक हैं। इस परिग्रह से मेरा कोई वास्ता नहीं है। जब परिग्रह से हमारा कोई संबंध नहीं रहता, उसी समय यह आत्मा अपने स्वभाव में आ जाती है – उसका नाम है ब्रह्मचर्य। यह ब्रह्मचर्य समस्त धर्मों का राजा है, संसार से तरने के लिए नौका के समान है, सुख-शांति का सागर है। जिस प्रकार मंदिर बनने के बाद स्वर्ण कलश चढ़ाते हैं, उसी प्रकार यह ब्रह्मचर्य धर्म पर चढ़ा हुआ कलश है। आत्मा में रमण करने का नाम ब्रह्मचर्य है।
इसके विपरीत राग-द्वेष आदि के कारण जो पाँचों इंद्रियों संबंधी विषय-वासनाएँ तथा भोग सामग्री हैं, उनमें रमण करना व्यभिचार कहलाता है। निश्चय से देखा जाए तो ब्रह्मचर्य का अर्थ आत्मा में रमण करना है, परंतु व्यवहार में हम इसके अर्थ को बहुत ही संकुचित रूप में लेते हैं। आज हमने मात्र स्त्री के त्याग को ही ब्रह्मचर्य मान लिया है। यदि हम ब्रह्मचर्य को समझें तो पाँचों इंद्रियों के विषयों का त्याग ही ब्रह्मचर्य कहलाता है। अकेले स्त्री का त्याग ही ब्रह्मचर्य नहीं है – वास्तव में इंद्रिय संयम ही ब्रह्मचर्य है। यदि हम पूर्ण ब्रह्मचर्य नहीं ले सकते तो ब्रह्मचर्य अणुव्रत ले सकते हैं, जिसमें अपनी पत्नी को छोड़कर शेष स्त्रियों को माँ, बहन अथवा बेटी के रूप में देखना। शील की महिमा जग प्रसिद्ध है। शील के प्रभाव से –सीता जी का अग्निकुंड, कमल युक्त जलकुंड बन गया द्रौपदी का चीर बढ़ता गया सेठ सुदर्शन की शूली, सिंहासन बन गई। जीवन में संयम और ब्रह्मचर्य ही श्रेयस्कर है।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से: नवीन, नितिन, सचिन, पंकज, भावना, गदिया, प्रकाश, आलोक, विनोद, अभिषेक, अक्षत, अभिनव, अभिनंदन, अरिंजय, अविरल मोदी, सुमनलता, रजनी, अंशु, नेहा, सुरभि, रोशनी मोदी, अभिलाषा जैन, अनुराग, अंकुश जैन, संतोष, मयंक, बबीता जैन, दीपिका जैन, शांतिलाल लालवानी आदि थे।



