अकसर फ्लाइट से ट्रैवल करने वाले यात्रियों के लिए एयरपोर्ट लाउंज एक आम अनुभव बन चुका है. लंबी लाइनें, भीड़भाड़ और महंगे रेस्टोरेंट से बचने के लिए ये लाउंज राहत का अनुभव देते हैं. एयरपोर्ट लाउंज में हमें कई तरह की सुविधा मिल जाती है जैसे एयर कंडीशनिंग, फ्री खाना, चार्जिंग पॉइंट, वाई-फाई और कुछ जगहों पर आरामदायक सोने की व्यवस्था.
ये सुविधाएं लग्ज़री का एहसास कराते हैं. जब आप अपने क्रेडिट या डेबिट कार्ड से एयरपोर्ट लाउंज में एंट्री करते हैं, तो आपको लगता है कि यह सुविधा बिल्कुल मुफ्त है. लेकिन सवाल यह है कि जब हम लाउंज में बिना कुछ चुकाए एंट्री कर लेते हैं तो उसका खर्च कौन उठा रहा है.
हर विजिट पर होता है 600 से 3000 रुपए तक खर्च
एयरपोर्ट लाउंज पर क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड से हर एंट्री के पीछे आपके बैंक द्वारा भुगतान किया गया पैसा होता है. भारत में आमतौर पर हर विज़िट के लिए बैंक 600 से 1,200 रुपये तक का भुगतान करते हैं. अगर आप इंटरनेशनल लाउंज में जा रहे हैं, तो ये कीमत 25 से 35 डॉलर (लगभग 2,000 से 3,000 रुपये) तक पहुंच सकती है.
यह खर्च सीधे-सीधे बैंक उठाते हैं और यह आपके कार्ड के ‘रिवॉर्ड बेनिफिट’ का हिस्सा होता है. इसका मतलब यह है कि जब आपने कार्ड बनवाया था, तब बैंक ने सोचा था कि इस सुविधा के बदले आप कार्ड का ज्यादा इस्तेमाल करेंगे, जिससे बैंक को ट्रांजैक्शन फीस मिलेगी. यही लॉयल्टी और ब्रांड बिल्डिंग की एक स्मार्ट रणनीति भी होती है.
बैंक का साइकोलॉजिल मार्केटिंग
बैंक लाउंज एक्सेस को केवल सुविधा नहीं, बल्कि एक स्टेटस सिंबल की तरह पेश करते हैं. जब कोई यात्री भीड़ से हटकर एक शांति भरे माहौल में आराम करता है, तो उसे अपने कार्ड से एक जुड़ाव महसूस होता है. इससे वो उसी कार्ड का ज्यादा इस्तेमाल करता है, और बैंक को ट्रांजैक्शन फीस के ज़रिए पैसा मिलता है. साथ ही ग्राहक प्रीमियम कार्ड की तरफ आकर्षित भी होता है, जिससे बैंक को और ज्यादा मुनाफा होता है.
लेकिन इस पूरे मॉडल में सभी को कुछ न कुछ फायदा हो रहा है. जहां एक तरफ यात्रियों को सुविधाएं मिल रही हैं, वहीं बैंक को ग्राहकों की लॉयल्टी और ट्रांजैक्शन फीस मिलती है. इसके साथ ही लाउंज को स्टेबल इनकम भी मिल रही है.
