Vedant Samachar

क्या बच्चों को भी हो सकती है अपेंडिक्स की बीमारी, कैसे दिखते हैं लक्षण ?

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अगर आपका बच्चा बार-बार पेट दर्द की शिकायत करता है तो ये आम गैस या अपच नहीं, बल्कि अंपेडिक्स की बीमारी ( एपेंडिसाइटिस) का संकेत हो सकता है. जी हां, एपेंडिसाइटिस सिर्फ बड़ों की नहीं, बच्चों की भी गंभीर बीमारी बन सकती है. अगर समय रहते लक्षण न पहचाने जाएं तो यह जानलेवा भी हो सकता है. आइए जानते हैं कि बच्चों में एपेंडिसाइटिस के क्या लक्षण होते हैं, इसके क्या कारण हैं और इसका इलाज क्या है- ताकि आप समय रहते सही कदम उठा सकें और अपने बच्चे को सुरक्षित रख सकें.

मेदांता अस्पताल में पीडियाट्रिक सर्जरी और यूरोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ.शंदीप कुमार सिन्हा ने बताया कि एपेंडिसाइटिस किसी भी उम्र में हो सकता है, यहां तक कि बहुत छोटे बच्चों में भी. खासतौर पर 5 साल से बड़े बच्चों में इसके मामले ज्यादा देखे जाते हैं लेकिन टॉडलर्स यानी 1 से 3 साल तक के बच्चों में भी यह बीमारी हो सकती है. एपेंडिक्स एक छोटी थैली की तरह अंग होता है, जो हमारी बड़ी आंत से जुड़ा होता है. जब इसमें किसी वजह से सूजन आ जाती है जैसे मल जमा हो जाना, संक्रमण तो ये एपेंडिसाइटिस कहलाता है. इसमें तेज पेट दर्द, बुखार, मतली, उल्टी और खाने की इच्छा न होना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं.

एपेंडिक्स के लक्षण क्या होते हैं

डॉ. सिन्हा कहते हैं– छोटे बच्चों में सबसे बड़ी दिक्कत ये होती है कि वे अपने लक्षण ठीक से बता नहीं पाते. कई बार तो बच्चा बस चिड़चिड़ा हो जाता है, खाना खाने से मना करता है या उसका पेट फूला हुआ लगता है. यही कारण है कि बच्चों में इस बीमारी की पहचान देर से होती है और इलाज में देरी हो जाती है. 5 साल से छोटे बच्चों में तो लक्षण शुरू होने के 24 घंटे के भीतर ही एपेंडिक्स फट सकता है, जिससे स्थिति गंभीर हो सकती है.

कैसे करें बचाव

बहुत से लोग मानते हैं कि एपेंडिसाइटिस सिर्फ बड़े बच्चों या वयस्कों में होता है, लेकिन हकीकत यह है कि यह समस्या छोटे बच्चों में भी हो सकती है. नीचे लिखे कुछ सिचुएशन को ध्यान में रखें और उसी हिसाब से एक्शन लें.

अगर बच्चा पेट के निचले दाएं हिस्से में बार-बार दर्द की शिकायत करे, बुखार हो, उल्टी हो या लगातार थकान महसूस करे, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए. अगर समय पर इलाज न किया जाए, तो एपेंडिक्स के फटने की वजह से पेट के अंदर गंभीर संक्रमण (पेरीटोनाइटिस) हो सकता है, जो जानलेवा हो सकता है.

डॉक्टर आमतौर पर शारीरिक जांच, खून की जांच और अल्ट्रासाउंड जैसी इमेजिंग जांचों के जरिए एपेंडिसाइटिस का पता लगाते हैं. छोटे बच्चों में सीटी स्कैन कम ही किया जाता है क्योंकि इससे रेडिएशन का खतरा होता है. सबसे जरूरी होता है एक अनुभवी पीडियाट्रिक सर्जन द्वारा क्लीनिकल परीक्षण.

इलाज की बात करें तो अगर एपेंडिक्स नहीं फटा है, तो कुछ मामलों में सिर्फ एंटीबायोटिक दवाओं से इलाज संभव होता है. लेकिन ज्यादातर मामलों में सर्जरी यानी एपेंडेक्टॉमी की जरूरत पड़ती है, जिसमें सूजे हुए एपेंडिक्स को हटा दिया जाता है.

सर्जरी के बाद ज्यादातर बच्चे जल्दी ठीक हो जाते हैं और कुछ ही दिनों में घर लौट सकते हैं. लेकिन अगर एपेंडिक्स फट चुका हो, तो उन्हें ज्यादा समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ सकता है और IV एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं.

डॉ. रमन कुमार का, अकेडमी ऑफ फैमिली फिजिशियंस ऑफ इंडिया के चेयरमैन ने बताया कि- “एपेंडिसाइटिस के मामलों में समय बेहद अहम होता है,” अगर बच्चा पेट दर्द की लगातार शिकायत करता है, खासतौर पर पेट के निचले दाएं हिस्से में तो इसे हल्के में न लें. समय रहते सही जांच और इलाज से बच्चे को गंभीर परेशानी से बचाया जा सकता है. याद रखें, एपेंडिसाइटिस एक मेडिकल इमरजेंसी हो सकती है. समय पर इलाज से ही बचाव संभव है.

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