मुंबई, 29 जून 2026: सोनी सब का शो हस्तिनापुर के वीर पांडवों और कौरवों के अनकहे बचपन के वर्षों को जीवंत करने पर केन्द्रित है। शो में उन रिश्तों, मूल्यों और अनुभवों को प्रदर्शित किया गया है, जिन्होंने हस्तिनापुर के भविष्य को आकार दिया। इस यात्रा के केंद्र में हैं भीष्म पितामह, जिनका किरदार निभा रहे हैं मनीष वाधवा। भीष्म पितामह को उनके ज्ञान और राज्य तथा आने वाली पीढ़ियों के प्रति अटल कर्तव्यनिष्ठा के लिए जाना जाता है।
इस बातचीत में मनीष वाधवा ने भीष्म पितामह जैसे प्रतिष्ठित किरदार में कदम रखने के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि किस तरह वे इस आइकॉनिक रोल को निभाने के लिए अपनी सोच और दृष्टिकोण अपनाते हैं। साथ ही, उन्होंने युवा कलाकारों के साथ अपने गहरे जुड़ाव के बारे में बात की और यह भी कहा कि ‘हस्तिनापुर के वीर’ के ज़रिए वे दर्शकों तक कौन-सी मूल्य और सीख पहुँचाना चाहते हैं।
- भीष्म पितामह महाभारत के सबसे प्रतिष्ठित और यादगार किरदारों में से एक हैं। जब आपको यह भूमिका ऑफर की गई, तो आपका पहला विचार क्या था?
भीष्म पितामह का किरदार ही मेरे ‘हाँ’ कहने की सबसे बड़ी वजह था। ईश्वर का आभार है कि मुझे भीष्म के रूप में कदम रखने का अवसर मिला। हर दिन किसी अभिनेता को इतना प्रतिष्ठित और सम्मानित किरदार निभाने का मौका नहीं मिलता। यदि कोई किरदार मुझे उत्साहित करता है, चुनौती देता है और मुझे एक अभिनेता के रूप में आगे बढ़ने का अवसर देता है, तो मैं तुरंत उसकी ओर आकर्षित हो जाता हूँ। भीष्म पितामह ऐसा ही एक किरदार है और उन्हें स्क्रीन पर जीवंत करना मेरे लिए सचमुच सम्मान की बात है। - हर अभिनेता किसी मशहूर किरदार में अपनी अलग पहचान लेकर आता है। भीष्म पितामह का किरदार निभाने के लिए आपका दृष्टिकोण क्या रहा है?
भीष्म पितामह का किरदार निभाने के लिए मेरा तरीका उन सभी बातों पर आधारित रहा है, जो मैंने वर्षों से पढ़ा, सुना और सीखा है। वे एक ऐसे व्यक्तित्व हैं, जो अपनी बुद्धिमत्ता, त्याग और सिद्धांतों के प्रति अटूट समर्पण से परिभाषित होते हैं और मैंने पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ इन गुणों को अपने अभिनय में उतारने की कोशिश की है। साथ ही मेरा मानना है कि हर प्रस्तुति की अपनी अलग पहचान होनी चाहिए, क्योंकि हर अभिनेता किसी किरदार से अलग तरह से जुड़ता है। मेरी कोशिश रही है कि भीष्म पितामह को इस तरह पेश करूँ, जो उनकी विरासत के प्रति सच्चा हो और साथ ही मेरे अपने अनुभव और दृष्टिकोण को भी दर्शाए। - भीष्म पितामह के कौन-से गुणों से आप व्यक्तिगत तौर पर सबसे ज़्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं?
भीष्म पितामह के कई प्रशंसनीय गुणों में से, मैं व्यक्तिगत तौर पर सबसे ज़्यादा जुड़ाव महसूस करता हूँ उनके अनुशासन, बुद्धिमत्ता और कर्तव्य के प्रति अटूट समर्पण से। ये ही गुण उन्हें एक कालजयी और प्रेरणादायक व्यक्तित्व बनाते हैं। बतौर अभिनेता मेरा मानना है कि अनुशासन हमारी कला की नींव है, जबकि बुद्धिमत्ता और ज़िम्मेदारी हमें पेशेवर और निजी जीवन दोनों में सही दिशा दिखाते हैं। मैं अपना काम पूरी ईमानदारी से करता हूँ और समझता हूँ कि काम की अहमियत क्या है यह सीख हमें भीष्म से लेनी चाहिए। कई मायनों में मैं अपनी यात्रा में इन मूल्यों को अपनाने की कोशिश करता हूँ और मुझे लगता है कि हर कलाकार के लिए ये गुण बेहद ज़रूरी हैं। - चूँकि, हस्तिनापुर के वीर पांडवों और कौरवों के बचपन के वर्षों पर केंद्रित है, दर्शक इस शो में भीष्म पितामह का कौन-सा नया रूप देखने को पाएँगे?
भीष्म पितामह एक बेहद गहरे और परतदार किरदार हैं और ‘हस्तिनापुर के वीर’ दर्शकों को उनका एक नया रूप देखने का मौका देता है जहाँ वे और भी संवेदनशील और स्नेहपूर्ण दिखाई देते हैं। शो में यह भी दिखाया गया है कि पांडवों और कौरवों दोनों के लिए उनके भीतर कितना गहरा प्यार और देखभाल है। वे हमेशा निष्पक्ष रहते हैं और हर बच्चे को बराबरी से देखते हैं, उन्हें लगातार अपनी बुद्धिमत्ता और चिंता के साथ मार्गदर्शन देते हैं। दर्शक सिर्फ हस्तिनापुर के संरक्षक ही नहीं, बल्कि एक सुरक्षात्मक गुरु और दादा-नुमा शख्सियत को देखेंगे, जिनका स्नेह और मार्गदर्शन आने वाली पीढ़ी को आकार देता है। वे सिर्फ बच्चों के ही नहीं बल्कि माता-पिता के भी मार्गदर्शक हैं। - पौराणिक धारावाहिकों में अक्सर एक खास उपस्थिति और बॉडी लैंग्वेज की ज़रूरत होती है। भीष्म पितामह के लिए आपने इन पहलुओं पर किस तरह काम किया?
हर किरदार, चाहे वह ऐतिहासिक हो, पौराणिक हो या समकालीन, अपनी अलग शारीरिकता और उपस्थिति की माँग करता है। भीष्म पितामह के लिए ज़रूरी था कि उनके व्यक्तित्व को समझने के साथ-साथ यह भी जाना जाए कि वे खुद को कैसे प्रस्तुत करते होंगे उनका चलना, बैठना, बोलना और अलग-अलग परिस्थितियों में प्रतिक्रिया देना कैसा होगा। किरदार का अध्ययन करने के साथ मैंने शारीरिक तैयारी पर भी ध्यान दिया। नियमित वर्कआउट, योग और ट्रेनिंग के ज़रिए मैंने इस भूमिका के लिए ज़रूरी ताकत और गरिमा लाने की कोशिश की। इन सभी पहलुओं ने मिलकर वह आभा, गरिमा और प्रभावशाली उपस्थिति बनाई, जिसे दर्शक भीष्म पितामह के साथ जोड़ते हैं। - आपका युवा कलाकारों के साथ सेट पर एक खास जुड़ाव है। इतने बड़े कलाकार समूह के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा है?
युवा कलाकारों के साथ काम करना मेरे लिए सचमुच एक बेहद शानदार अनुभव रहा है। चाहे वे पांडवों का किरदार निभा रहे हों या कौरवों का, हर बच्चा बेहद प्रतिभाशाली, ईमानदार और उत्साह से भरा हुआ है। वे सेट पर एक अलग ऊर्जा लेकर आते हैं और मुझे उनके साथ समय बिताना सचमुच अच्छा लगता है। मुझे सबसे ज़्यादा उनकी ईमानदारी और सहजता पसंद आती है, जो वे अपने अभिनय में प्रदर्शित करते हैं। ऑफ-स्क्रीन भी कई बच्चे मुझे प्यार से ‘पितामह’ या ‘दादू’ बुलाते हैं, जिससे हमारा रिश्ता और भी खास बन जाता है। इन बच्चों ने मुझे फादर्स डे पर एक प्यारा सरप्राइज़ भी दिया। वे मेरे पास आकर गोद में बैठते हैं और खेलते हैं। हम सीन के बीच में बहुत सारी हँसी-मज़ाक, बातें और यादगार पल साझा करते हैं, जिससे सेट पर एक गर्मजोशी और सकारात्मक माहौल बनता है। - एक अनुभवी अभिनेता होने के नाते, क्या आप कभी सेट पर युवा कलाकारों को मार्गदर्शन देते हैं? आमतौर पर आप उन्हें किस तरह की सलाह देते हैं?
जब भी मुझे मौका मिलता है, मैं अपने अनुभव से कुछ सीखें ज़रूर साझा करता हूँ। मैं उन्हें यह भी याद दिलाता हूँ कि अपने बचपन का आनंद लें, ऑफ-स्क्रीन मज़े करें और फिर जब परफॉर्म करने का समय आए तो पूरी तरह ध्यान और समर्पण के साथ काम करें। एक बात मैं हमेशा उन्हें समझाने की कोशिश करता हूँ कि सकारात्मक या नकारात्मक टिप्पणियों में ज़्यादा न उलझें। यदि आप तारीफ पर ज़्यादा ध्यान देंगे तो यह आपको अनावश्यक रवैया दे सकता है और यदि आलोचना पर ज़्यादा ध्यान देंगे, तो यह आपको हतोत्साहित कर सकता है।
मैं उन्हें यह भी बताता हूँ कि स्क्रीन पर अपने किरदार में पूरी तरह डूबना ज़रूरी है, लेकिन अपनी पहचान कभी नहीं खोनी चाहिए। जब मैं कैमरे का सामना करता हूँ, तो भीष्म पितामह बन जाता हूँ, लेकिन जैसे ही शॉट खत्म होता है, मैं फिर से मनीष वाधवा बन जाता हूँ। मैं बच्चों को भी यही समझाता हूँ कि अभिनय को इसी तरह अपनाएँ अपने किरदार की अच्छी बातें ज़रूर सीखें, लेकिन उस भूमिका को हमेशा अपने साथ लेकर न चलें।
- आज के दर्शक, खासकर माता-पिता, आपके किरदार और शो से क्या सीख लेकर जाएँगे, ऐसी आपकी उम्मीद है?
मेरा मानना है कि ‘हस्तिनापुर के वीर’ सिर्फ एक पौराणिक धारावाहिक नहीं है, बल्कि यह उन मूल्यों और जीवन की सीखों को दर्शाता है, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। माता-पिता के लिए यह शो एक मज़बूत याद दिलाने वाला है कि बच्चों को दिया जाने वाला सबसे बड़ा उपहार उनके चरित्र और मूल्यों की मज़बूत नींव है। बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें किसी भी आकार में ढाला जा सकता है और सही आकार देना माता-पिता की ज़िम्मेदारी है। शो में मेरा किरदार यही संदेश देता है कि ‘जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे’। कहानी उपदेश नहीं देती, बल्कि सोचने और आत्ममंथन करने का अवसर देती है, साथ ही हमें अपने बारे में और अपने बच्चों के बारे में विचार करने का मौका देती है।
सोनी सब पर देखिए हस्तिनापुर के वीर, हर सोमवार से शनिवार रात 9:00 बजे।

