कोरबा 20 मई 2026 । सीबीएसई 12वीं बोर्ड परीक्षा 2026 के परिणामों में विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों के अंकों में आई गिरावट ने शिक्षा जगत में नई बहस छेड़ दी है। खासतौर पर फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स जैसे विषयों में अपेक्षाकृत कम अंक मिलने के कारण कई मेधावी छात्र 75 प्रतिशत के आवश्यक मापदंड को पूरा नहीं कर सके, जिससे उनके IIT, NIT और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश के सपनों पर असर पड़ा है।
इसी मुद्दे पर इंडस पब्लिक स्कूल दीपका के प्राचार्य डॉ. संजय गुप्ता ने “ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम” (OSM) को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि वर्तमान डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली विद्यार्थियों की वास्तविक समझ, तार्किक क्षमता और अभिव्यक्ति का सही मूल्यांकन करने में पूरी तरह सफल नहीं दिखाई दे रही है।
डॉ. गुप्ता के अनुसार विज्ञान विषयों में विद्यार्थी केवल अंतिम उत्तर तक पहुंचने के लिए नहीं पढ़ते, बल्कि वे हर स्टेप को समझते हुए समाधान विकसित करते हैं। लेकिन ऑन-स्क्रीन मार्किंग में निर्धारित “स्टेप मार्किंग” को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे में यदि किसी छात्र का अंतिम उत्तर सही हो, लेकिन उसने तय प्रारूप में स्टेप प्रस्तुत नहीं किए हों, तो उसके अंक काट लिए जाते हैं। इसका सबसे अधिक नुकसान उन छात्रों को होता है जिनकी अवधारणाएं मजबूत होती हैं, लेकिन उनकी प्रस्तुति शैली अलग होती है।
उन्होंने बताया कि पारंपरिक मूल्यांकन प्रणाली में शिक्षक उत्तर पुस्तिका को समग्र रूप से देखते थे और छात्र की सोच सही दिशा में होने पर आंशिक अंक देकर प्रोत्साहित करते थे। जबकि डिजिटल मूल्यांकन में प्रक्रिया अधिक यांत्रिक और सीमित हो गई है। परीक्षकों के पास समय कम होता है और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उत्तर जांचने के दौरान मानवीय संवेदनशीलता तथा लचीलापन कम दिखाई देता है।
प्राचार्य डॉ. संजय गुप्ता ने कहा कि इसका सबसे बड़ा प्रभाव उन विद्यार्थियों पर पड़ा है जो पूरे वर्ष कठिन मेहनत कर इंजीनियरिंग और तकनीकी संस्थानों में प्रवेश का सपना देखते हैं। कई छात्र जेईई मेन में अच्छा स्कोर लाने के बावजूद बोर्ड परीक्षा में 75 प्रतिशत अंक नहीं ला पाने के कारण पात्रता से बाहर हो गए। उन्होंने इसे विद्यार्थियों के लिए मानसिक रूप से हतोत्साहित करने वाली स्थिति बताया।
उन्होंने कहा कि आज की शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों पर पहले से ही अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का दबाव है। ऐसे में यदि मूल्यांकन प्रणाली उनकी मेहनत और ज्ञान के साथ न्याय नहीं करती, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। बोर्ड को मूल्यांकन प्रक्रिया को अधिक संतुलित, मानवीय और छात्रहितैषी बनाने की आवश्यकता है।
डॉ. गुप्ता ने सुझाव दिया कि विज्ञान विषयों के मूल्यांकन में केवल तयशुदा स्टेप्स के बजाय अवधारणा आधारित मूल्यांकन को महत्व दिया जाना चाहिए। यदि विद्यार्थी की सोच सही है और अंतिम उत्तर तार्किक रूप से उचित है, तो उसे पर्याप्त अंक मिलने चाहिए। साथ ही परीक्षकों को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वे विद्यार्थियों की उत्तर लेखन शैली में विविधता को स्वीकार कर सकें।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य विद्यार्थियों में ज्ञान, नवाचार और आत्मविश्वास विकसित करना है, न कि केवल उन्हें तकनीकी नियमों में बांध देना। यदि मूल्यांकन प्रणाली विद्यार्थियों की रचनात्मकता और विश्लेषण क्षमता को कम आंकने लगेगी, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव देश की प्रतिभाओं पर पड़ेगा।
अंत में डॉ. संजय गुप्ता ने विद्यार्थियों और अभिभावकों से निराश न होने की अपील करते हुए कहा कि किसी एक परीक्षा या प्रतिशत से जीवन की संभावनाएं समाप्त नहीं होतीं। निरंतर मेहनत, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच ही सफलता का वास्तविक आधार हैं।

