मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब भारत के ऑटो सेक्टर के लिए भी चिंता का कारण बन सकता है. मारुति सुजुकी से लेकर टाटा मोटर्स, हुंडई, बजाज ऑटो और अशोक लेलैंड तक कई बड़ी कंपनियों का कारोबार इस क्षेत्र से जुड़ा है. अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो निर्यात घटने, माल ढुलाई महंगी होने और कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है.
जानकारों का मानना है कि इस तनाव से दो तरह से असर हो सकता है. पहली बात तो ये कि जिन कंपनियों का मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका (MENA) क्षेत्र में ज्यादा निर्यात है, उनकी बिक्री पर सीधा असर पड़ेगा. दूसरी बात, बाकी कंपनियों पर सीधा असर तो नहीं होगा, लेकिन माल ढुलाई यानी फ्रेट दरें बढ़ने, कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने और कच्चे माल की लागत बढ़ने से असर दिखेगा.
किसे है सबसे ज्यादा खतरा?
ऑटोकार प्रोफेशनल्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 सालों में भारत का ऑटो एक्सपोर्ट काफी बढ़ा है. भारत के लिए MENA क्षेत्र कार और दोपहिया गाड़ियों के लिए एक बड़ा बाजार बन गया है. कुछ कंपनियों के लिए यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है. हुंडई इंडिया सबसे ज्यादा प्रभावित कंपनियों में है. कंपनी अपने कुल उत्पादन का लगभग 21% निर्यात करती है और इनमें से करीब 40% इसी क्षेत्र में जाता है. अशोक लेलैंड अपने निर्यात का 30-40% यहां भेजती है. बजाज ऑटो अपने निर्यात का 10-15% मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका में भेजती है. भारत की सबसे बड़ी दोपहिया निर्यातक कंपनी है. कंपनी कुल उत्पादन का लगभग 40% निर्यात करती है, इसलिए MENA का योगदान कुल उत्पादन का लगभग 4-6% है.
टाटा-मारुति पर क्या असर?
टाटा मोटर्स की जगुआर लैंड रोवर (JLR) अपनी लगभग 77% गाड़ियां निर्यात करती है. इनमें से करीब 8% MENA में जाती हैं. यह कुल उत्पादन का लगभग 6% हिस्सा है. JLR की गाड़ियां प्रीमियम सेगमेंट की हैं, इसलिए अमीर खाड़ी देशों में मांग घटने से राजस्व पर ज्यादा असर पड़ सकता है. मारुति सुजुकी अपने एक्सपोर्ट का 12.5% हिस्सा MENA भेजती है. यह कंपनी के कुल प्रोडक्शन का लगभग 2% है. प्रतिशत कम है, लेकिन मारुति की बाजार हिस्सेदारी बड़ी है, इसलिए थोड़ी भी गिरावट पूरे सेक्टर पर असर डाल सकती है.
इतना ही नहीं, टीवीएस मोटर, हीरो मोटोकॉर्प और महिंद्रा एंड महिंद्रा का MENA में एक्सपोजर बहुत कम है. टीवीएस का 3% से कम निर्यात वहां जाता है. हीरो और महिंद्रा के लिए यह अभी बड़ा बाजार नहीं है. इनके लिए असर ज्यादा लागत बढ़ने के रूप में आएगा, न कि बिक्री घटने के रूप में.
माल ढुलाई और सप्लाई चेन पर असर
जिन कंपनियों का सीधा निर्यात कम है, वे भी बढ़ती फ्रेट दरों और सप्लाई चेन की रुकावट से प्रभावित होंगी. अभी ज्यादातर कंपनियों के लिए फ्रेट खर्च कुल राजस्व का 1-3% है. यह कम दिखता है, लेकिन ऑटो उद्योग में मुनाफा मार्जिन सीमित होता है, इसलिए थोड़ी बढ़ोतरी भी असर डालती है. भारत से मिडिल ईस्ट, यूरोप या अफ्रीका जाने वाली गाड़ियां आमतौर पर रेड सी और गल्फ ऑफ एडन के रास्ते जाती हैं. अगर यहां लंबे समय तक रुकावट रही तो जहाजों को लंबा रास्ता लेना पड़ेगा, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ेंगे. सिर्फ तैयार गाड़ियां ही नहीं, बल्कि पार्ट्स, सेमीकंडक्टर और खास कच्चा माल भी विदेश से आता है. अगर वैश्विक माल ढुलाई महंगी हुई तो इनकी लागत भी बढ़ेगी. कुल मिलाकर यह संघर्ष भारतीय ऑटो उद्योग के लिए बिक्री और लागत दोनों मोर्चों पर चुनौती बन सकता है.
