मुंबई,27दिसंबर । बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए स्पष्ट किया है कि ‘पद्म श्री’, ‘पद्म भूषण’, ‘पद्म विभूषण’ और ‘भारत रत्न’ जैसे नागरिक सम्मानों का उपयोग किसी भी व्यक्ति के नाम के आगे या पीछे नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ये सम्मान उपाधियां नहीं हैं और कानून में इन्हें नाम के साथ जोड़ने की अनुमति नहीं है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेशन की पीठ ने एक सार्वजनिक ट्रस्ट की बैठक से जुड़े विवाद की सुनवाई के दौरान की। सुनवाई के समय अदालत की नजर याचिका के शीर्षक पर पड़ी, जिसमें 2014 के पद्म श्री पुरस्कार विजेता डॉ. शरद एम. हर्डीकर का नाम “पद्म श्री डॉ. शरद एम. हर्डीकर” के रूप में उल्लेखित था। इस पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई और इसे कानून के विरुद्ध बताया।
1995 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
न्यायमूर्ति सुंदरेशन ने 1995 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा दिए गए ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत रत्न और पद्म पुरस्कार जैसे नागरिक सम्मान उपाधियां नहीं हैं। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि पुरस्कार विजेता इन सम्मानों का उपयोग अपने नाम के उपसर्ग या प्रत्यय के रूप में नहीं कर सकते।
अनुच्छेद 141 के तहत बाध्यकारी आदेश
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट का फैसला देश की सभी अदालतों और नागरिकों पर बाध्यकारी है। इसलिए इसका सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। अदालत ने निर्देश दिया कि भविष्य में अदालती कार्यवाहियों के दौरान किसी भी पक्ष द्वारा नाम के साथ ऐसे सम्मानों का प्रयोग न किया जाए।
साथ ही हाईकोर्ट ने निचली अदालतों को भी निर्देशित किया कि वे अपने रिकॉर्ड में यह सुनिश्चित करें कि किसी भी नागरिक सम्मान को व्यक्ति के नाम के साथ नहीं जोड़ा जाए। इस आदेश को न्यायिक प्रक्रिया में एकरूपता और संवैधानिक प्रावधानों के पालन की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।



