हिंदू धर्मग्रंथों में लंका का वर्णन एक ऐसी स्वर्णनगरी के रूप में मिलता है, जिसकी भव्यता और ऐश्वर्य की तुलना आज भी किसी स्वप्नलोक से की जाती है. रामायण में वर्णित सोने की लंका केवल एक नगर नहीं थी, बल्कि यह शक्ति, तपस्या, मायावी कला और अहंकार का प्रतीक भी थी. इस नगरी को पाने के लिए रावण ने ऐसे-ऐसे कर्म किए, जो उसे महाबली तो बनाते गए, लेकिन आखिर में उसके विनाश का कारण भी बने. आइए जानते सोने की लंका की पौराणिक कहानी के बारे में.
कैसे हुई सोने की लंका की रचना?
रामायण के अनुसार, लंका का निर्माण विश्वकर्मा ने किया था, जिन्हें देवताओं का शिल्पकार कहा जाता है. शुरुआत में यह नगरी भगवान शिव के लिए बनाई गई थी. कहा जाता है कि विश्वकर्मा ने इस नगर को शुद्ध सोने से सजाया था. महलों, द्वारों, सड़कों और प्रासादों में स्वर्ण की चमक सूर्य के समान दमकती थी.
कुबेर थे लंका के पहले स्वामी
लंका के पहले राजा कुबेर थे, जो धन के देवता भी माने जाते हैं. कुबेर ने लंका को अपनी राजधानी बनाया और यहीं से देवताओं के कोष का संचालन किया. लेकिन कुबेर का सौतेला भाई रावण, जो कि पुलस्त्य ऋषि का पुत्र था, इस वैभव को देखकर ईर्ष्या और लालच से भर गया.
रावण की तपस्या और ब्रह्मा का वरदान
लंका को पाने की लालसा में रावण ने भयंकर तपस्या की. उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए वर्षों तक कठोर साधना की और अपने सिर तक काटकर आहुति देने से भी पीछे नहीं हटा. ब्रह्मा जी उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा. रावण ने वरदान में देवता, दानव और यक्षों से अमरता मांगी, लेकिन मनुष्यों को तुच्छ समझकर उन्हें वरदान में शामिल नहीं किया. यही भूल आगे चलकर उसके विनाश का कारण बनी.
कुबेर को लंका से बाहर किया
वरदान प्राप्त करने के बाद रावण ने अपनी शक्ति का प्रयोग कर कुबेर को लंका से बाहर निकाल दिया और खुद लंका का राजा बन बैठा. उसने कुबेर का पुष्पक विमान भी छीन लिया, सोने की लंका की अद्भुत भव्यता, रामायण में लंका का वर्णन बहुत ही मनोहारी है. कहा जाता है कि लंका के महल सोने और रत्नों से जड़े थे, सड़कें स्वर्ण से मढ़ी हुई थीं,
भवनों में हीरे, मोती और माणिक जड़े थे. नगर में जलकुंड, उद्यान और अशोक वाटिका जैसी सुंदर जगहें थीं. हनुमान जी ने जब लंका में प्रवेश किया, तो उन्होंने इसकी समृद्धि देखकर भी क्षणभर के लिए विचलित होना स्वीकार किया, लेकिन तुरंत प्रभु राम का स्मरण कर स्वयं को संयमित किया.
लंका का पतन कैसे हुआ?
लंका की भव्यता के साथ-साथ रावण का अहंकार और अधर्म भी बढ़ता गया. माता सीता का हरण करना उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई. भगवान राम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई की और आखिर में रावण का वध कर अधर्म का अंत किया. कहा जाता है कि युद्ध के बाद सोने की लंका का वैभव नष्ट हो गया और आज की लंका (श्रीलंका) में उसी स्थान पर स्थित मानी जाती है, हालांकि स्वर्णनगरी अब केवल ग्रंथों और कथाओं में ही जीवित है.
सोने की लंका से मिलने वाली सीख
सोने की लंका हमें यह संदेश देती है कि अत्यधिक लालच, अहंकार और अधर्म चाहे जितना वैभव क्यों न दे, उसका अंत विनाश में ही होता है. रावण विद्वान, महाबली और तपस्वी था, लेकिन उसके लालच ने आखिर में उससे सबकुछ छीन लिया.



