Vedant Samachar

अमेरिका में ऑटिज्म के केस भारत से ज्यादा क्यों, क्या पैरासिटामोल से कोई कनेक्शन है?

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अमेरिका में ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (CDC) के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में 8 साल के हर 31 में से एक बच्चों को ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) है. यह आंकड़ा पिछले सालों की तुलना में अधिक है. भारत की बात करें तो इंडियन ऑटिज्म सेंटर के मुताबिक, यहां 68 में से किसी एक बच्चे को यह होता है. आंकड़ों पर गौर करें तो भारत की तुलना में अमेरिका में ऑटिज्म के केस अधिक है.

अमेरिका में ऑटिज्म के बढ़ते मामलों पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी चिंता जाहिर की है. ट्रंप ने पैरासिटामोल की दवा को इस बीमारी के केस बढ़ने का एक कारण माना है.

अब सवाल है कि अमेरिका में इस डिसऑर्डर के केस क्यों बढ़ रहे हैं और क्या वाकई इसका संबध पैरासिटामोल से है? इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमने दिल्ली एम्स और इहबास के डॉक्टरों से बातचीत की है.

दिल्ली सरकार के मानव व्यवहार और संबंधित विज्ञान संस्थान (IHBAS) में मनोरोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. ओमप्रकाश बताते हैं कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे का सामाजिक व्यवहार, भाषा और बातचीत करने की क्षमता प्रभावित होती है. इस समस्या वाले बच्चे दूसरों से सामान्य तरीके से बात करने या अपनी भावनाएं साझा करने में मुश्किल महसूस करते हैं.

ऑटिज्म क्यों होता है, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन डॉक्टर मानते हैं कि इसके कई कारण हो सकते हैं. इसमें जेनेटिक बदलाव, परिवार में पहले से होने वाले मामले, प्रेगनेंसी के दौरान संक्रमण, प्रदूषण, पोषण की कमी और कभी-कभी दवाओं का असर शामिल हो सकता है

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अध्ययन में यह पाया गया है कि जिन परिवारों में पहले से ऑटिज्म के मामले हैं, वहां इसका जोखिम बढ़ जाता है. इसके अलावा, बड़े उम्र के माता-पिता से जन्मे बच्चों में भी ऑटिज्म होने की संभावना थोड़ी ज्यादा हो सकती है. इसका मतलब है कि यह समस्या सिर्फ एक कारण से नहीं, बल्कि कई कारणों के साथ मिलकर विकसित होती है. चिंता की बात यह है कि ऑटिज्म का कोई इलाज नहीं है, इसे केवल कंट्रोल किया जा सकता है.

अमेरिका में ऑटिज्म के केस क्यों ज्यादा हैं?
डॉ ओम प्रकाश कहते हैं कि अमेरिका में ऑटिज्म के मामले भारत की तुलना में कहीं ज्यादा रिपोर्ट किए जाते हैं. इसका एक बड़ा कारण वहां की बेहतर हेल्थ केयर सिस्टम और व्यापक स्क्रीनिंग है. वहां बच्चे बहुत जल्दी डेवलपमेंटल चेकअप से गुजरते हैं और थोड़े भी अलग लक्षण दिखने पर डॉक्टर तुरंत जांच कर लेते हैं. वहीं भारत में अक्सर लक्षणों को देर तक पहचाना ही नहीं जाता और निदान भी कम उम्र में शायद ही हो पाता है

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है लाइफस्टाइल और जनसंख्या संबंधी पैटर्न है. पश्चिमी देशों में आमतौर पर लोग देर से बच्चे प्लान करते हैं. ज्यादा उम्र में प्रेग्नेंसी होने पर जेनेटिक म्यूटेशन की संभावना बढ़ती है, जो ऑटिज्म के जोखिम को प्रभावित कर सकती है.

तीसरी वजह है लोगों की समझ और समाज का नजरिया भी है. अमेरिका में ऑटिज्म को मानसिक बीमारी या कलंक की तरह नहीं देखा जाता, बल्कि इसे स्वास्थ्य मुद्दे के रूप में स्वीकार कर समय रहते इलाज और थेरेपी शुरू की जाती है. भारत में इसके बजाय, लोग कम जागरूक हैं और समाज में डर या हिचकिचाहट के कारण कई परिवार इस समस्या को छुपा लेते हैं. इसलिए अमेरिका में मामलों की संख्या ज्यादा दिखती है, जबकि भारत में वास्तविक संख्या अक्सर सामने ही नहीं आ पाती है. यह कुछ संभावित कारण हो सकते हैं जिनकी वजह से अमेरिका में केस ज्यादा और भारत में कम रिपोर्ट किए जाते हैं.

क्या पैरासिटामोल खाने से ऑटिज्म होता है?
अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने पैरासिटामोल को ऑटिज्म होने का एक कारण बताया है, हालांकि उनके इस दावे को अमेरिकी स्वास्थ्य संस्था से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने खारिज कर दिया है.

इस मामले में एम्स नई दिल्ली में पीडियाट्रिक विभाग की प्रमुख प्रोफेसर डॉ. शेफाली गुलाटी कहती हैं कि आज तक ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण या शोध नहीं है जो यह दर्शाता हो कि डॉक्टर की सलाह पर गर्भवती महिलाओं द्वारा पैरासिटामोल लेने पर ऑटिज़्म हो सकता है.

डॉ गुलाटी के मुताबिक, ऑटिज्म कोई सामान्य बीमारी नहीं है. यह किसी एक कारण से नहीं होती है. यह आनुवंशिक कारकों (जीन से संबंधित) या एपिजेनेटिक कारणों (एक ऐसी प्रक्रिया जिसके द्वारा जीन में निहित जानकारी शरीर के किसी कार्य में बदल जाती है) से भी हो सकती है.

डॉ. गुलाटी कहती हैं कि कई रिसर्च में ऑटिज्म का पैरासिटामोल से संबंध पाया गया है, लेकिन उनमें से कोई भी रिसर्च इसका प्रत्यक्ष कारण-स्थापित नहीं कर सकी है. कुछ समय पहले स्टॉकहोम के कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट में भी रिसर्च की गई थी, जिसमें पाया गया कि गर्भावस्था के दौरान पैरासिटामोल का उपयोग बच्चों में ऑटिज़्म, एडीएचडी (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) या बौद्धिक अक्षमता के जोखिम से जुड़ा नहीं है. ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता है कि पैरासिटामोल से ऑटिज्म होता है. इस मामले में और रिसर्च करने की जरूरत है.

तो क्या प्रेग्नेंसी में पैरासिटामोल खाना पूरी तरह सेफ है?
डॉ. शेफाली कहती हैं कि प्रेग्नेंसी में कोई भी दवा हमेशा डॉक्टर की सलाह पर ही खानी चाहिए, लेकिन देखा जाता है कि महिलाएं हल्के से बुखार या बदन दर्द में पैरासिटामोल या क्रोसिन जैसी दवाएं खा लेती हैं. लेकिन इससे बचना चाहिए. कोई भी दवा खुद से खाना नुकसान दे सकता है.

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