Vedant Samachar

80C का फायदा खत्म, फिर भी FD से बेहतर हैं ये सरकारी स्कीम्स

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जब से नई कर व्यवस्था (New Tax Regime) आकर्षक हुई है, करदाताओं के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. सवाल यह है कि क्या अब पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF), नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट (NSC) और सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम (SCSS) जैसी छोटी बचत योजनाओं में निवेश करने का कोई मतलब रह गया है? नई टैक्स व्यवस्था अपनाने वाले करदाताओं को इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80C के तहत निवेश पर मिलने वाली छूट नहीं मिलती. परंपरागत रूप से, भारतीय निवेशक इन योजनाओं का चुनाव ही इसलिए करते थे ताकि वे टैक्स बचा सकें. अब जब वह हटा ली गई है, तो कई निवेशक सीधे फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की ओर भाग रहे हैं, क्योंकि वहां कोई लॉक-इन पीरियड (पैसे जमा रखने की समय सीमा) की बाध्यता नहीं होती. लेकिन क्या यह जल्दबाजी में लिया गया फैसला सही है? आंकड़ों और रिटर्न की गहराई में उतरें, तो कहानी कुछ और ही बयां करती है.

FD पर भारी पड़ रही हैं सरकारी बचत योजनाएं
सबसे पहले बात करते हैं मुनाफे की, यानी ब्याज दर की. बैंक में पैसा रखने पर आपको कितनी बढ़ोतरी मिलती है और सरकारी योजनाओं में कितनी, यह तुलना बेहद जरूरी है. वर्तमान बाजार का हाल देखें तो अधिकांश बैंक अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) योजनाओं पर सालाना 6 से 6.5 प्रतिशत के आसपास ब्याज दे रहे हैं.

इसके ठीक उलट, सरकार द्वारा समर्थित छोटी बचत योजनाएं (Small Savings Schemes) अब भी 7 प्रतिशत से अधिक का रिटर्न दे रही हैं. आंकड़ों पर नजर डालें.

पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम: 7.4% ब्याज.
सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम (SCSS): 8.2% ब्याज.
किसान विकास पत्र (KVP): 7.5% ब्याज.
पीपीएफ (PPF): 7.1% ब्याज.
सुकन्या समृद्धि योजना: 8.2% ब्याज.
ये आंकड़े साफ बताते हैं कि अगर आप सिर्फ रिटर्न को पैमाना मानें, तो सरकारी स्कीम्स बैंक एफडी से कोसों आगे हैं. बिना किसी जोखिम के 8 प्रतिशत से ज्यादा का रिटर्न मिलना आज के दौर में बड़ी बात है.

कमाई पर किसकी कैंची ज्यादा चलती है?
निवेश करते समय सिर्फ ब्याज दर देखना काफी नहीं होता, यह देखना भी जरूरी है कि टैक्स कटने के बाद आपकी जेब में कितना पैसा आया. छोटी बचत योजनाओं की एक बड़ी खूबी यह है कि नई टैक्स व्यवस्था में भी इनसे होने वाली आय पर कर का प्रभाव एफडी के मुकाबले कम या शून्य हो सकता है (विशेषकर पीपीएफ और सुकन्या समृद्धि जैसी योजनाओं में).

इसे एक सरल उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिए कोई बैंक आपको FD पर 7% ब्याज दे रहा है. अगर आप 10% टैक्स स्लैब में आते हैं, तो आपको उस ब्याज आय पर 10% टैक्स देना होगा. इसका मतलब है कि टैक्स कटने के बाद आपका असली मुनाफा (Net Return) घटकर महज 6.3% रह जाएगा.

वहीं दूसरी ओर, पीपीएफ (PPF) और सुकन्या समृद्धि जैसी योजनाओं में मिलने वाला ब्याज पूरी तरह से टैक्स-फ्री होता है, चाहे आप किसी भी टैक्स रिजीम में क्यों न हों. यानी जो 7.1% या 8.2% आपको दिख रहा है, वह पूरा का पूरा आपकी जेब में जाएगा. नई टैक्स रिजीम में 80C की छूट न मिलने के बावजूद, टैक्स-फ्री ब्याज इन योजनाओं को FD से कहीं ज्यादा आकर्षक बनाता है.

लॉक-इन पीरियड, मजबूरी नहीं
अक्सर निवेशक FD की तरफ इसलिए झुकते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका पैसा फंस जाएगा (Lock-in). लेकिन वित्तीय अनुशासन (Financial Discipline) के नजरिए से देखें, तो छोटी बचत योजनाओं का लॉक-इन पीरियड दरअसल एक वरदान है.

जब आप पीपीएफ में पैसा डालते हैं, जहां 15 साल का लॉक-इन होता है, तो आप अनजाने में ही अपनी रिटायरमेंट के लिए एक बड़ा फंड तैयार कर रहे होते हैं. इसी तरह, सुकन्या समृद्धि योजना में निवेश करके आप अपनी बेटी के भविष्य के लिए एक निश्चित राशि सुरक्षित कर देते हैं. एफडी में पैसा लिक्विड (जल्द निकालने योग्य) होता है, इसलिए अक्सर लोग उसे छोटी-मोटी जरूरतों पर खर्च कर देते हैं और बड़े लक्ष्य पीछे छूट जाते हैं. लंबी अवधि की संपत्ति निर्माण (Wealth Creation) के लिए पैसे का कुछ समय के लिए लॉक होना बेहद जरूरी है.

पोर्टफोलियो में संतुलन कैसे बनाएं?
अब सवाल उठता है कि एक आम निवेशक को क्या रणनीति अपनानी चाहिए? क्या सारा पैसा सरकारी योजनाओं में लगा दें? दिल्ली स्थित चार्टर्ड अकाउंटेंट और वेल्थ एडवाइजर दीपक अग्रवाल का कहना है कि निवेश में संतुलन बहुत जरूरी है.

दीपक अग्रवाल सलाह देते हैं, “लंबी अवधि में संपत्ति बनाने के लिए अपने पोर्टफोलियो का लगभग 30% हिस्सा फिक्स्ड इनकम इंस्ट्रूमेंट्स (निश्चित आय वाले साधनों) में निवेश करना समझदारी है. जब आपके वित्तीय लक्ष्य 15 साल या उससे अधिक दूर हों, तो केवल एफडी पर निर्भर न रहें. आपको एफडी के साथ-साथ गोल्ड, डेट फंड्स और विशेष रूप से पीपीएफ व सुकन्या जैसी छोटी बचत योजनाओं का मिश्रण अपने पोर्टफोलियो में रखना चाहिए.”

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