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कोरबा, 23 नवंबर (वेदांत समाचार)। केंद्र सरकार द्वारा 21 नवंबर 2025 को चार विवादास्पद श्रम संहिताओं की अधिसूचना जारी किए जाने के बाद देशभर में ट्रेड यूनियनों का विरोध तेज हो गया है। दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के विरोध के बावजूद सरकार ने औद्योगिक संबंध, मजदूरी संहिता, सामाजिक सुरक्षा और पेशागत सुरक्षा एवं स्वास्थ्य से जुड़े चारों श्रम विधेयकों को लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी है।
एटक के प्रदेश पदाधिकारी दीपेश मिश्रा ने प्रेस नोट जारी कर कहा कि सरकार ने 29 पुराने श्रम कानूनों को समाहित कर चार संहिताओं में बदल दिया है, जो देश के मेहनतकशों के हितों के खिलाफ और गैर-लोकतांत्रिक कदम है। उनके अनुसार नए लेबर कोड से कर्मचारियों को मिलने वाली कागजी सुरक्षा भी खत्म हो जाएगी और इससे देश की लगभग तीन चौथाई कंपनियों में बंधुआ मजदूरी जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।
मिश्रा ने आरोप लगाया कि नए प्रावधानों के तहत 300 से कम कर्मचारियों वाली कंपनियों को ‘हायर एंड फायर’ नीति लागू करने की खुली छूट मिल जाएगी, जिससे कामगारों को मनमर्जी से नौकरी से निकाला जा सकेगा। उन्होंने कहा कि लेबर कोड में निजी कंपनियों को भी बिना किसी कड़े नियम के मनचाहे समय पर कंपनी बंद करने की छूट दी गई है।
उन्होंने कहा कि श्रम संहिता में काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 करने का प्रावधान मजदूरों पर प्रताड़ना जैसा है। साथ ही, कर्मचारियों के हड़ताल करने पर प्रतिबंधों को बढ़ा दिया गया है और ट्रेड यूनियन के पंजीयन की प्रक्रिया को इतना जटिल बना दिया गया है कि श्रम संगठनों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियन कानून 1926 को कमजोर कर देना मजदूरों की आवाज दबाने की स्पष्ट कोशिश है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता पर प्रतिक्रिया देते हुए मिश्रा ने कहा कि सरकार दावा कर रही है कि असंगठित क्षेत्र के सभी मजदूर सुरक्षा के दायरे में आएंगे, लेकिन अधिसूचना में इसका कोई स्पष्ट विवरण नहीं है। उन्होंने कहा कि नौकरी से निकाले गए कामगारों के लिए विशेष फंड की व्यवस्था का दावा भी ‘कोरा भ्रम’ है।
दीपेश मिश्रा ने कहा कि नया लेबर कोड मजदूरों के बुनियादी अधिकारों पर “गहरी चोट” है और इसके खिलाफ देशभर के मजदूर संगठन 26 नवंबर को व्यापक देशव्यापी आंदोलन छेड़ेंगे।



