Vedant Samachar

घर खरीदें या किराये पर रहें? फैसला लेने से पहले EMI और रेंट का ये ‘नफा-नुकसान’ ज़रूर जान लें…

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घर खरीदना हर किसी का सपना होता है, लेकिन सवाल ये है कि जेब पर क्या भारी पड़ेगा – हर महीने की किश्त (EMI) या घर का किराया (Rent)? ये वो उलझन है जिसमें हम सब कभी न कभी फंसते हैं. आइए इसका पूरा हिसाब-किताब समझते हैं.

अगर आप करियर शुरू कर रहे हैं, या नौकरी पक्की नहीं है, तो किराया बेस्ट है. न डाउन पेमेंट की झंझट, न लोन का बोझ. जब मर्ज़ी, घर बदल लो. लेकिन एक पेंच है! ये किराया हर साल बढ़ता है और 10-15 साल बाद भी वो घर ‘आपका’ नहीं होता.

EMI मतलब आप हर महीने पैसे देकर अपने घर के मालिक बन रहे हैं. ये एक तरह का ज़बरदस्ती वाला इंवेस्टमेंट है. शुरू में महंगा लगता है, लेकिन 15-20 साल बाद पूरी प्रॉपर्टी आपकी होती है. और हां, होम लोन पर टैक्स छूट का तगड़ा फायदा अलग से.

सीधी बात: अगर आपकी नौकरी पक्की है और इनकम हर साल बढ़ने की उम्मीद है, तो EMI का रिस्क ले सकते हैं. लेकिन अगर आपकी जॉब में बहुत अनिश्चितता है या बार-बार शहर बदलना पड़ता है, तो किराये पर रहना ही समझदारी है. लचीलापन (flexibility) बहुत ज़रूरी है.

सिर्फ किराया देते रहना एक ‘रेंट ट्रैप’ (किराये का जाल) है, जिसमें पैसा जाता है, पर कुछ बनता नहीं. एक स्मार्ट तरीका ये भी है, अगर बजट है, तो घर खरीदकर उसे किराये पर चढ़ा दें. हो सकता है किराये के पैसे से आपकी EMI ही निकल जाए. आपका घर भी बन गया और जेब पर बोझ भी कम हुआ.

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