Vedant Samachar

पार्किंसंस रोग की शुरुआती पहचान में नई उम्मीद: नैनोटेक्नोलॉजी से बनी अनोखी खोज

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पार्किंसंस रोग एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जो आमतौर पर बढ़ती उम्र के साथ सामने आती है. इसे लोग अक्सर “भूलने की बीमारी” भी कहते हैं. भारत सहित पूरी दुनिया में इस रोग के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. बड़ी समस्या यह है कि इसका पता अधिकतर मामलों में देर से चलता है, जिससे इलाज सीमित हो जाता है और मरीजों के जीवन की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ता है. देर से पहचान होने के कारण स्वास्थ्य प्रणालियों पर भी बोझ बढ़ता है और रोगियों को लंबे समय तक इलाज की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है.

पार्किंसंस की पहचान के लिए वैज्ञानिक लंबे समय से नए तरीके खोज रहे हैं. इसी दिशा में INST मोहाली के वैज्ञानिकों ने अहम रिसर्च कि है. उन्होंने पाया कि α-synuclein नामक प्रोटीन इस बीमारी से गहराई से जुड़ा है. जब यह प्रोटीन अपने स्वरूप को बदलकर हानिकारक रूप अपनाता है, तब न्यूरोलॉजिकल क्षति की शुरुआत होती है. इसी आधार पर रिसर्चर ने एक नैनोटेक्नोलॉजी-आधारित बायोसेंसर विकसित किया है, जो इस प्रोटीन की एक्टिविटी को सटीकता से पहचान सकता है.

गोल्ड नैनोक्लस्टर्स पर आधारित बायोसेंसर
नए बायोसेंसर का निर्माण सोने के बेहद छोटे कणों (गोल्ड नैनोक्लस्टर्स) की मदद से किया गया है. इन कणों को विशेष अमीनो अम्ल से कवर किया गया है. रिसर्चर ने Proline और Histidine का उपयोग किया है जहां Proline α-synuclein प्रोटीन के सामान्य रूप को पहचानता है, वहीं Histidine इसके हानिकारक और जमा हुए रूप की पहचान करता है. इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बेहद शुरुआती चरण में बीमारी की पहचान करने में सक्षम है. शुरुआती पहचान से न केवल मरीज को सही समय पर इलाज मिल सकता है, बल्कि बीमारी की गति को भी धीमा किया जा सकता है.

नैनोटेक्नोलॉजी से पार्किंसंस जांच के फायदे
शुरुआती चरण में बीमारी की पहचान संभव होगी.

महंगे और जटिल टेस्ट का सरल विकल्प मिलेगा.

हेल्थ सिस्टम पर दबाव कम किया जा सकेगा.

ग्रामीण और छोटे शहरों तक जांच की सुविधा पहुंचाई जा सकेगी.

भविष्य में पार्किंसंस के इलाज और रिसर्च को नई दिशा मिलेगी.

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