डेस्क। उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ IAS अधिकारी अभिषेक प्रकाश की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के करीबी माने जाने वाले 2006 बैच के इस अधिकारी को राज्य सरकार ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के चलते चार्जशीट थमा दी है।
अभिषेक प्रकाश पर दो प्रमुख मामलों में कार्रवाई चल रही है। पहला, इन्वेस्ट यूपी के तत्कालीन सीईओ रहते हुए एक सौर ऊर्जा कंपनी से 400 करोड़ रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप, और दूसरा, लखनऊ के सरोजनीनगर स्थित भटगांव में डिफेंस कॉरिडोर के लिए भूमि अधिग्रहण में प्रशासनिक लापरवाही। इन आरोपों की जांच के बाद नियुक्ति विभाग ने उन्हें चार्जशीट जारी की है, जिसके जवाब के लिए उन्हें 15 दिन का समय दिया गया है। जवाब मिलने के बाद तय किया जाएगा कि मामले में स्वतंत्र जांच अधिकारी की नियुक्ति की जाएगी या नहीं।
एसएईएल सोलर रिश्वतकांड
प्रकाश पर आरोप है कि उन्होंने एसएईएल सोलर पी-6 प्राइवेट लिमिटेड के प्रोजेक्ट को मंज़ूरी दिलाने के एवज में रिश्वत मांगी थी। इस सिलसिले में कंपनी द्वारा गोमतीनगर थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। पुलिस ने मामले में दलाल निकांत जैन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। इसी शिकायत के आधार पर अभिषेक प्रकाश को 20 मार्च 2025 को निलंबित किया गया।
भटगांव भूमि अधिग्रहण में लापरवाही
चार्जशीट में भूमि अधिग्रहण से जुड़ी प्रशासनिक लापरवाहियों का भी ज़िक्र है। तत्कालीन राजस्व परिषद अध्यक्ष रजनीश दुबे की जांच में पाया गया कि अभिषेक प्रकाश (तत्कालीन डीएम) और कुछ अन्य अधिकारियों की भूमिका में गंभीर चूक हुई। चार बिंदुओं पर जवाब मांगा गया है।
इन्वेस्ट यूपी की बैठक पर भी सवाल
चार्जशीट में इन्वेस्ट यूपी की 12 मार्च 2025 को हुई मूल्यांकन समिति की बैठक का भी उल्लेख है, जिसमें एसएईएल सोलर का प्रस्ताव मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति को भेजने का निर्णय लिया गया था। बाद में यह निर्णय बदला गया और प्रकरण को पुनर्मूल्यांकन के लिए लौटा दिया गया। सरकार यह जानना चाहती है कि यह फैसला किन कारणों और किसके निर्देश पर बदला गया।
निलंबन बहाल होने की संभावना नहीं
चार्जशीट जारी होने के बाद यह लगभग तय है कि अभिषेक प्रकाश का निलंबन जल्द बहाल नहीं होगा। मामले की गंभीरता और उच्च स्तरीय प्रकृति को देखते हुए जांच लंबी चल सकती है। ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है कि अगर वाकई 400 करोड़ रुपये की रिश्वत की मांग हुई थी, तो यह जानना ज़रूरी है कि इसकी हिस्सेदारी किन अधिकारियों और किन स्तर तक गई। क्या मामले की जांच की अगली दिशा यही होगी?



