विकास चौहान,रायगढ़,03 जुलाई 2025। रायगढ़ जिले के तमनार इलाके में जंगलों की कटाई और खनन परियोजनाओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। मुड़ागांव क्षेत्र में महाजेंको के कोल ब्लॉक के लिए 214 हेक्टेयर वन भूमि पर पेड़ गिराने का विरोध अभी जारी ही था कि अब जिंदल पावर लिमिटेड (जेपीएल) ने गारे पेलमा सेक्टर-1 में 120 हेक्टेयर जंगल को साफ करने की तैयारी शुरू कर दी है।
जेपीएल को यह खदान 50 साल की लीज पर मिली है, और हर साल करीब 15 मिलियन टन कोयला निकालने का लक्ष्य रखा गया है। खनन कार्य ओपन कास्ट और अंडरग्राउंड, दोनों तकनीकों से किया जाएगा। कंपनी ने गारे पेलमा सेक्टर-1 में 3020 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित करने की योजना बनाई है, जिसमें कई गांवों की जमीनें शामिल हैं।
इस खनन परियोजना से बुडिया, रायपारा, बागबाड़ी, आमगांव समेत आसपास के ग्रामीण प्रभावित होंगे। ग्रामीणों का आरोप है कि जंगल कटने से न केवल उनकी आजीविका और जल-स्रोत प्रभावित होंगे, बल्कि उनका पारंपरिक जीवन पूरी तरह उजड़ जाएगा।
ग्रामीणों में बढ़ता आक्रोश
तमनार में पहले से ही महाजेंको के खनन प्रोजेक्ट के चलते कई गांव विस्थापन की मार झेल रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि हर साल नई-नई परियोजनाओं के नाम पर जंगलों की बलि दी जा रही है, और उनकी आवाज को जनसुनवाई के दौरान अनसुना कर दिया जाता है।
मुड़ागांव में पेड़ों की कटाई पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद अब गारे पेलमा में भी तनाव गहराता दिख रहा है। ग्रामीण संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर वन भूमि पर अंधाधुंध कटाई और जमीन अधिग्रहण नहीं रोका गया, तो बड़े आंदोलन छेड़े जाएंगे।
“जंगल पर हमला, आदिवासी संस्कृति पर प्रहार”
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि रायगढ़ के जंगल सिर्फ लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े हैं। एक स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता ने कहा,
“हरियाली सिर्फ दिखावे की मुहिम तक सीमित रह गई है। कोयला कंपनियों के आगे सरकारें घुटने टेक देती हैं, और जंगल का नुकसान कभी पूरा नहीं हो सकता।”
कहां तक जाएगी जनसुनवाई की रस्म?
जेपीएल के गारे पेलमा प्रोजेक्ट के लिए जल्द ही जनसुनवाई आयोजित की जाएगी, जिसमें ग्रामीण अपनी आपत्तियां दर्ज कराएंगे। हालांकि स्थानीय लोगों का आरोप है कि पिछली जनसुनवाइयों में भी उनकी बातों को नजरअंदाज किया गया और खनन को हरी झंडी दे दी गई।
ग्रामीणों ने रायगढ़ जिला प्रशासन से अपील की है कि जंगल, पानी और पारंपरिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का गंभीरता से आकलन किया जाए, और केवल “विकास” के नाम पर हजारों पेड़ों और लोगों के भविष्य की कुर्बानी न दी जाए।



