- डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)
केंद्रीय बजट 2026 ने भारत की युवा नीति, शिक्षा प्रणाली और कौशल विकास की दिशा को लेकर एक आवश्यक और स्वस्थ बहस को जन्म दिया है। स्कूलों और कॉलेजों में कंटेंट क्रिएशन लैब्स की घोषणा, एनीमेशन, गेमिंग और डिजिटल मीडिया जैसे उभरते क्षेत्रों में ट्रेनिंग, तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप-टेक में फेलोशिप, ये सभी संकेत देते हैं कि भारत बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप अपनी युवा शक्ति को तैयार करना चाहता है। ₹250 करोड़ के विशेष प्रावधान के साथ, यह पहल 2030 तक 20 लाख पेशेवरों की मांग को पूरा करने के लिए युवाओं को डिजिटल इकोनॉमी और रचनात्मक करियर के लिए तैयार करेगी। हालांकि प्रश्न यह नहीं है कि यह प्रयास सही है या गलत, बल्कि यह है कि इसका क्रियान्वयन किस दृष्टिकोण के तहत किया जाएगा।
आज का युवा भारत डिजिटल युग की स्वाभाविक उपज है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और शॉर्ट-वीडियो प्लेटफॉर्म उसके जीवन का हिस्सा हैं। ऐसे में डिजिटल कंटेंट और क्रिएटर इकोनॉमी को पूरी तरह नकारना अव्यावहारिक होगा। बजट 2026 की विशेषता यही है कि वह युवाओं की इस वास्तविकता को स्वीकार करता है। परंतु किसी भी राष्ट्रीय नीति का मूल्यांकन भावनाओं या ट्रेंड से नहीं, बल्कि उसकी दीर्घकालिक राष्ट्र-निर्माण क्षमता से होना चाहिए।
‘रील बनाना’ अपने आप में हल्का या तुच्छ कार्य नहीं है। इसमें कहानी कहने की कला, तकनीकी समझ, प्रस्तुति कौशल और दर्शक मनोविज्ञान की भूमिका होती है। यदि इसे सही शैक्षणिक ढाँचे में सिखाया जाए, तो यह कम्युनिकेशन, क्रिएटिविटी और उद्यमिता को बढ़ावा दे सकता है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब लोकप्रियता, व्यूज़ और वायरल होने को ही सफलता का अंतिम मानक बना दिया जाए। शिक्षा का उद्देश्य यदि केवल तात्कालिक प्रसिद्धि बन जाए, तो समाज की बौद्धिक गहराई प्रभावित होती है।
यहाँ भारत और चीन की तुलना उपयोगी हो जाती है। चीन ने दशकों तक विज्ञान, गणित और इंजीनियरिंग को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाकर कौशल निर्माण को एक अनुशासित मिशन के रूप में आगे बढ़ाया। इसके परिणामस्वरूप उसने ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी रिसर्च में उल्लेखनीय बढ़त हासिल की। भारत का लोकतांत्रिक और सामाजिक ढांचा अलग है; यहाँ रचनात्मक स्वतंत्रता और विविधता एक बड़ी शक्ति है। भारत को चीन की नकल नहीं करनी चाहिए, लेकिन यह सीख अवश्य लेनी चाहिए कि कौशल निर्माण को तात्कालिक ट्रेंड नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देखा जाए।
बजट 2026 में यह संतुलन कागज़ पर दिखाई देता है। एक ओर डिजिटल और रचनात्मक उद्योगों को बढ़ावा है, वहीं दूसरी ओर आईआईटी, आईआईएससी और अनुसंधान संस्थानों में एआई, डीप-टेक और वैज्ञानिक अवसंरचना पर निवेश का संकेत भी है। असली चुनौती इसके क्रियान्वयन में है। यदि कंटेंट क्रिएशन लैब्स केवल एडिटिंग टूल्स और एल्गोरिदम समझाने तक सीमित रहीं, तो उनका प्रभाव क्षणिक होगा। लेकिन यदि इन्हें समस्या-आधारित परियोजनाओं, डेटा साक्षरता, मीडिया नैतिकता, बौद्धिक संपदा और डिजिटल वेल-बीइंग से जोड़ा गया, तो यही पहल भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए भारत को तैयार कर सकती है।
कौशल का वास्तविक अर्थ उपकरण चलाना नहीं, बल्कि सोचने और समाधान खोजने की क्षमता है। गणित अनुशासन देता है, विज्ञान प्रश्न पूछना सिखाता है, भाषा विचारों को स्पष्ट करती है और नागरिक शास्त्र जिम्मेदारी का बोध कराता है। डिजिटल रचनात्मकता जब इन बुनियादी स्तंभों पर आधारित होती है, तभी वह राष्ट्र की शक्ति बन सकती है। रोजगार के संदर्भ में भी यही अंतर निर्णायक है। डिजिटल अर्थव्यवस्था अस्थायी गिग-वर्क से लेकर उच्च-गुणवत्ता वाले इनोवेशन-आधारित प्रोफेशंस तक, दोनों तरह के अवसर देती है। नीति का उद्देश्य यह होना चाहिए कि युवा केवल प्लेटफॉर्म पर निर्भर न रहें, बल्कि तकनीक और उद्योग के निर्माता भी बनें।
बजट 2026 की असली परीक्षा इस बात में है कि क्या वह युवाओं को केवल ट्रेंड-फॉलोअर बनाएगा या क्षमता-निर्माता बनाने में भी सहयोग करेगा। रील एक माध्यम हो सकती है, लक्ष्य नहीं। यदि भारत इस संतुलन को साध पाया, तो यही बजट युवा शक्ति को न केवल रोजगार देगा, बल्कि वैश्विक सम्मान और दीर्घकालिक राष्ट्रीय सामर्थ्य भी प्रदान करेगा।



