Vedant Samachar

इस मंदिर में हैं बजरंगबली के पैरों के निशान, यहीं किया था संजीवनी बूटी के लिए विश्राम!

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देवभूमि हिमाचल अपनी सुंदरता के साथ-साथ चमत्कारी मंदिरों के लिए भी दुनिया भर में प्रसिद्ध है. इन्हीं में से एक है शिमला की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित जाखू मंदिर. यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि रामायण काल की एक अहम घटना का गवाह भी माना जाता है. मान्यता है कि यहाँ आज भी हनुमान जी के पैरों के निशान मौजूद हैं, जिन्हें देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं. आइए जानते हैं इस मंदिर का पौराणिक महत्व.

जब हनुमान जी के भार से दब गया था पहाड़
पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेतायुग में जब लक्ष्मण जी मेघनाद के प्रहार से मूर्छित हो गए थे, तब हनुमान जी उनके प्राण बचाने के लिए हिमालय से संजीवनी बूटी लेने जा रहे थे. रास्ते में उन्होंने आकाश मार्ग से नीचे यक्ष ऋषि को तपस्या करते देखा. कहा जाता है कि संजीवनी बूटी की सटीक जानकारी और थोड़ा विश्राम करने के लिए हनुमान जी जाखू पर्वत पर उतरे थे. मान्यता है कि उस समय इस पहाड़ की ऊंचाई काफी ज्यादा थी, लेकिन जैसे ही हनुमान जी ने इस पर अपने कदम रखे, उनके विशालकाय भार से यह पहाड़ आधा जमीन में दब गया. यही कारण है कि यह पर्वत आज भी ऊपर से चपटा दिखाई देता है.

आज भी सुरक्षित हैं पदचिह्न
जाखू मंदिर के परिसर में आज भी वह स्थान सुरक्षित है जहां बजरंगबली के पैरों के निशान बने हुए हैं. श्रद्धालु इन पदचिह्नों की पूजा करते हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि हनुमान जी ने ऋषि यक्ष को वापस लौटते समय मिलने का वचन दिया था, लेकिन समय की कमी के कारण वे दूसरे रास्ते से निकल गए. बाद में उन्होंने ऋषि को दर्शन दिए और यहाँ उनकी एक मूर्ति प्रकट हुई.

जाखू मंदिर की मुख्य विशेषताएं
108 फीट ऊची प्रतिमा: यहा हनुमान जी की विशालकाय मूर्ति स्थापित है, जो समुद्र तल से 8000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. यह मूर्ति शिमला के लगभग हर कोने से दिखाई देती है.

बंदरों का साम्राज्य: इस मंदिर परिसर में भारी संख्या में बंदर पाए जाते हैं. माना जाता है कि ये उसी वानर सेना के वंशज हैं जो हनुमान जी के समय यहां मौजूद थी.

शिमला की सबसे ऊंची चोटी: यह मंदिर शिमला की सबसे ऊंची चोटी जाखू हिल पर स्थित है, जहां से हिमालय का अद्भुत नजारा दिखता है.

कैसे पहुंचें?
शिमला के मुख्य माल रोड से जाखू मंदिर तक पहुँचने के लिए आप पैदल चढ़ाई कर सकते हैं, जो करीब 30-45 मिनट का समय लेती है. इसके अलावा अब यहाँ रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे आप मात्र 5-6 मिनट में मंदिर पहुच सकते हैं.

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