Vedant Samachar

सोमनाथ: अटूट आस्था के 1000 वर्ष (1026–2026),विध्वंस नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत चेतना और स्वाभिमान की अमर गाथा

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प्रभास पाटन/गुजरात। सोमनाथ—यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, आस्था और सभ्यतागत चेतना का शाश्वत प्रतीक है। गुजरात के प्रभास पाटन में भारत के पश्चिमी तट पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान पर वर्णित है। “सौराष्ट्रे सोमनाथं च…” से आरंभ होने वाला यह उल्लेख सोमनाथ की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है।

शास्त्रों में वर्णित है कि सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन मात्र से व्यक्ति पापों से मुक्त होता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यही कारण है कि यह तीर्थ सदियों से करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है।

वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। इसी वर्ष 1026 में हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं, जब गजनी के महमूद ने इस पवित्र धाम पर आक्रमण कर मंदिर को ध्वस्त किया था। यह आक्रमण केवल एक संरचना पर नहीं, बल्कि भारत की आस्था और सभ्यता पर किया गया प्रहार था।

इतिहासकारों के अनुसार, उस आक्रमण में भारी विध्वंस और क्रूरता हुई। इसके बावजूद सोमनाथ की चेतना को नष्ट नहीं किया जा सका। बीते एक हजार वर्षों में मंदिर पर कई बार हमले हुए, लेकिन हर बार यह फिर खड़ा हुआ। यह भारत की आत्मशक्ति और पुनर्जागरण की अद्वितीय मिसाल है।

सोमनाथ मंदिर का वर्तमान भव्य स्वरूप 11 मई 1951 को अस्तित्व में आया। यह वर्ष 2026, मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूर्ण होने का भी साक्षी है। तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोले गए थे। यह क्षण स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान का ऐतिहासिक अध्याय बना।

आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प सरदार वल्लभभाई पटेल ने लिया था। 1947 में दीवाली के अवसर पर उनकी सोमनाथ यात्रा ने उन्हें भीतर तक आंदोलित किया और उन्होंने यहीं मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा की। दुर्भाग्यवश वे उद्घाटन समारोह तक जीवित नहीं रहे, लेकिन उनका सपना साकार होकर राष्ट्र के सामने खड़ा हुआ।

इस दौरान प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस आयोजन को लेकर आशंकित थे और सरकारी सहभागिता के पक्ष में नहीं थे, किंतु राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद अपने निर्णय पर अडिग रहे। उनके इस कदम ने स्वतंत्र भारत में सांस्कृतिक आत्मविश्वास को नई दिशा दी।

सोमनाथ के पुनर्निर्माण में के.एम. मुंशी की भूमिका भी ऐतिहासिक रही। उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ: द श्राइन इटरनल’ मंदिर के संघर्ष और पुनर्जन्म की गाथा को गहराई से प्रस्तुत करती है।

1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे। 1897 में चेन्नई में दिए गए अपने व्याख्यान में उन्होंने कहा था कि सोमनाथ जैसे मंदिर भारत की सभ्यता को किसी भी पुस्तक से अधिक गहराई से समझाते हैं। बार-बार नष्ट होकर भी अपने खंडहरों से खड़े होना ही भारत की राष्ट्रीय चेतना है।

देवी अहिल्याबाई होलकर के प्रयासों से लेकर जैन मुनि हेमचंद्राचार्य की साधना तक, सोमनाथ हर कालखंड में विविध परंपराओं को जोड़ता रहा है। आज भी इसके दर्शन से मन में शांति और आत्मा में एक अलौकिक अनुभूति होती है।

एक हजार वर्षों बाद भी सोमनाथ का समुद्र उसी गर्जना के साथ उसकी गाथा सुनाता है। आक्रमणकारी इतिहास की धूल में समा चुके हैं, जबकि सोमनाथ आज भी विश्वास, आशा और सृजन की शक्ति का प्रतीक बनकर खड़ा है।

सोमनाथ हमें यह संदेश देता है कि घृणा और कट्टरता से विनाश हो सकता है, लेकिन आस्था में निर्माण की असीम शक्ति होती है। यदि खंडित सोमनाथ फिर खड़ा हो सकता है, तो भारत भी अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेकर एक समृद्ध और विकसित राष्ट्र बन सकता है।

जय सोमनाथ।
(नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं और सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं।)

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