Vedant Samachar

Coal India के पुनर्गठन की प्रक्रिया तेज, लिस्टिंग और निजीकरण को लेकर बढ़ी चिंता

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रायपुर,29 दिसम्बर (वेदांत समाचार)। देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कोयला कंपनी Coal India Limited (CIL) एक बड़े संरचनात्मक बदलाव की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा Coal India की अनुषंगी कंपनियों को वर्ष 2030 तक स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध करने के निर्देश के बाद यह संकेत और स्पष्ट हो गया है कि कंपनी के पुनर्गठन की प्रक्रिया अब निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है।

कोल सेक्टर पर लंबे समय से नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि यह प्रक्रिया नई नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत लगभग दो दशक पहले हो चुकी थी। वर्ष 2003-04 के दौरान कोयला उत्पादन में आउटसोर्सिंग की शुरुआत हुई, जिसने धीरे-धीरे Coal India के पारंपरिक एकाधिकार को कमजोर करना शुरू किया। उस समय यह प्रक्रिया सीमित स्तर पर थी, लेकिन मौजूदा केंद्र सरकार के कार्यकाल में इसे तेज गति से आगे बढ़ाया गया है।

इसके बाद वर्ष 2010 में Coal India का आंशिक विनिवेश किया गया। उस समय यह कहा गया था कि आगे हिस्सेदारी नहीं बेची जाएगी, लेकिन बाद के वर्षों में सरकार की हिस्सेदारी लगातार घटती गई और विनिवेश का आंकड़ा लगभग एक तिहाई तक पहुंच गया। वर्ष 2020 में कैप्टिव और व्यावसायिक खनन के लिए कोल ब्लॉकों की नीलामी ने इस बदलाव को और गहरा कर दिया।

वर्तमान स्थिति में देशभर में बड़ी संख्या में कोल ब्लॉक निजी और सरकारी कंपनियों को आवंटित किए जा चुके हैं, जिनमें से कई में उत्पादन भी शुरू हो चुका है। बीते वित्तीय वर्ष में इन खदानों से भारी मात्रा में कोयले का उत्पादन हुआ। ऊर्जा क्षेत्र की बड़ी कंपनियां, जो पहले Coal India से कोयला खरीदती थीं, अब स्वयं खनन कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे Coal India की बाजार हिस्सेदारी पर सीधा असर पड़ सकता है।

उधर, Coal India की कुछ अनुषंगी कंपनियों की आर्थिक स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। पूर्वी क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों ईसीएल और बीसीसीएल की कार्यप्रणाली और वित्तीय सेहत को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कर्मचारियों को समय पर वेतन भुगतान, कोयले की गुणवत्ता और बिक्री जैसे मुद्दे इन कंपनियों के सामने गंभीर चुनौती बने हुए हैं।

अनुषंगी कंपनियों की लिस्टिंग को लेकर कर्मचारी संगठनों और यूनियनों में असंतोष और आशंका का माहौल है। उनका मानना है कि लिस्टिंग के बाद निजीकरण की प्रक्रिया और तेज हो सकती है तथा लाभ आधारित कार्यप्रणाली को बढ़ावा मिलेगा। इससे आउटसोर्सिंग और ठेका प्रथा का विस्तार होने की संभावना है, जिसका सीधा असर श्रमिकों और स्थायी कर्मचारियों की सेवा शर्तों पर पड़ेगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि Coal India के पुनर्गठन और परिसंपत्तियों के मौद्रीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो राष्ट्रीय कोयला वेतन समझौता (NCWA), वेतन संरचना, सामाजिक सुरक्षा और अन्य सुविधाओं पर दबाव बन सकता है। इससे कर्मचारियों की दीर्घकालिक सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

जानकारों का यह भी कहना है कि सरकार इस तथ्य से भली-भांति परिचित है कि वर्तमान में Coal India के कुल कोयला उत्पादन का बड़ा हिस्सा आउटसोर्सिंग के माध्यम से हो रहा है, जबकि कंपनी की स्थायी श्रमशक्ति लगातार घट रही है। ऐसे में तेजी से लिए जा रहे नीतिगत फैसलों का दूरगामी असर न केवल Coal India, बल्कि पूरे कोयला क्षेत्र और इससे जुड़े लाखों परिवारों पर पड़ने की संभावना है।

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