Vedant Samachar

Pollution Effect: 50 फीसदी घट गई है फेफड़ों की क्षमता, एक महीने से नहीं बंद हो रही खांसी, एम्स में आ रहे ऐसे-ऐसे मरीज

Vedant Samachar
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दिल्ली-एनसीआर का हवा बेहद प्रदुषित हो गई है. पिछले कुछ समय से तो AQI 400 के आस-पास चल रहा है. इससे सेहत पर काफी बुरा असर पड़ रहा है. बढ़ते प्रदुषण का असर खासतौर पर उन्हें प्रभावित कर रहा है, जिन्हें पहले से ही लंग से जुड़ी समस्याएं है. दिल्ली की ये जहरीली हवा सांस वाले मरीजों के लिए खतरनाक साबित हो रही है. उनके लिए इस हवा में सांस तक लेना मुश्किल हो गया है. हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि, क्लीनिक के बाहर भी मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. इस बात का दावा खुद AIIMS ने किया है.

डॉक्टरों के मुताबिक, स्मॉग बढ़ते ही मरीजों की सांस की दिक्कतें तेज हो गई है. मरीजों की फेफड़ों की क्षमता आधी तक रह गई है और उनकी खांसी हफ्तों नहीं, बल्कि महीनों तक ठीक नहीं हो रही. सुबह उठते ही सांस फूलना, सीने में जकड़न, थकान और लगातार खांसी जैसी समस्याएं आम हो गई हैं. ऐसे मरीजों को बार-बार अस्पताल आना पड़ रहा है.

AIIMS क्लीनिक के बाहर बढ़ रहे मरीज
दिल्ली की हवा इतनी खतरनाक और जहरीली होती जा रही है कि, सांस और लंग से जुड़ी समस्या वाले मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है. इसका असर एम्स (AIIMS) के इंटरस्टिशियल लंग डिजीज (ILD) क्लिनिक के बाहर साफ देखने को मिल रहा है. जहां आमतौर पर यहां करीब 30 मरीज आते हैं. वहीं, इस सर्दी प्रदुषण की वजह से मरीजों की संख्या दोगुनी हो गई है.

महिलाओं की हेल्थ पर दिख रहा ज्यादा असर
AIIMS के मुताबिक, मरीजों की बढ़ती संख्या में महिलाएं ज्यादा देखने को मिली हैं. जिनमें उन्हें खांसी लेने की समस्या ज्यादा देखने को मिली. कुछ महिलाओं से बात करने पर पता चला कि, उन्हें सुबह सांस लेने में काफी मु्श्किल हो रही है. साल के बाकी महीने तो खांसी जल्दी ठीक हो जाती है. लेकिन सर्दी शुरु होते ही सूखी खांसी और थकान बढ़ने लगती है. एक और महिला ने बताया कि, उन्हें एम्फीसीमा है, जिसमें फेफड़ों की हवा वाली थैलियां खराब हो जाती है. इससे उन्हें चलने में दिक्कत हो रही है और यहां तक उनके फेफड़ों की कैपेसिटी सिर्फ 50 फीसदी रह गई है. 1 महीने से खांसी में भी कोई आराम नहीं मिल रहा है.

क्या कहते हैं डॉक्टर्स?
AIIMS के पल्मोनरी और क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. विजय हड्डा, बताते हैं कि सर्दियों में मरीजों की हालत बिगड़ना अब आम बात हो गई है. वो कहते हैं कि- “आमतौर पर हम मरीजों को तीन से छह महीने में फॉलो-अप के लिए बुलाते हैं, लेकिन अक्टूबर से दिसंबर के बीच हालत इतने बिगड़ जाते हैं कि उन्हें हर दो हफ्ते में आना पड़ता है”

खराब हवा पहुंचा रही फेंफड़ों को नुकसान ?
डॉक्टर्स का मानना है कि ILD ( Interstitial Lung Disease) मरीजों की बढ़ती संख्या बाकी देशों की तुलना में भारत में ज्यादा है, जिसकी वजह खराब हवा हो सकती है. हालांकि, अभी ये कहना थोड़ा मुश्किल होगा कि प्रदुषण ILD की वजह है. क्योंकि अभी इसके पुख्ता आंकड़े नहीं मिले हैं. लेकिन इसी को समझने के लिए AIIMS एक अध्ययन शुरु करने जा रहा , जिसमें पता लगाया जाएगा कि, क्या वाकई ILD की वजह प्रदुषण है या नहीं. ये अध्ययन देशभर के 23 सेंटर में चल रहा है, जहां 10,000 ILD मरीजों के राष्ट्रीय डाटाबेस के साथ जोड़ा जाएगा.

लंग की बीमारी से जुझ रहे लोग ऐसे रखें ख्याल
डॉक्टर सलाह देते हैं कि जिन्हें लंग से जुड़ी समस्याएं हैं या ILD है उन्हें इस वक्त घर से कम से कम ही बाहर निकलना चाहिए. क्योंकि भले ही प्रदुषण फेंफड़े खराब होने की पूरी वजह न हो. लेकिन ये उनकी समस्या को और बढ़ा सकता है. अगर कोई इसकी चपेत में आ गया तो हालात गंभीर हो सकती है. इससे उन्हें ऑक्सीजन या वेंटिलेटर तक की जरूरत पड़ सकती है.

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