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भगवान शिव का नाम कैसे पड़ा त्रिपुरांतक? इस असुर के अंत से जुड़ी है कहानी

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भगवान शिव को संहारक कहा जाता है, लेकिन भगवान शिव बड़े ही दयालू हैं. कहा जाता है कि भगवान शिव मात्र जल अर्पित करने भर से प्रसन्न हो जाते हैं. भगवान शिव के अनेक नाम हैं. भगवान शिव को महेश, शंकर, नीलकंठ, रुद्र, त्रिलोचन आदि नामों से पुकारा जाता है. भगवान शिव को त्रिपुरांतक नाम से भी जाना जाता है. ये नाम भगवान शिव के एक अवतार का है.

पौराणिक कथाओं के अनुसार, शिव जी ने ये अवतार त्रिपुरासुर के वध के लिए लिया था. त्रिपुरासुर कोई एक राक्षस नहीं बल्कि, राक्षसराज तारकासुर के तीन पुत्र थे, जिनका नाम तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली था. ऐसे में आइए जानते हैं त्रिपुरासुर के अंत और भगवान शिव के इस अवतार और नाम की कथा.

तारकासुर का अंत और उसके पुत्रों की तपस्या
भगवान शिव के पुत्र और देवताओं के सेनापति भगवान कार्तिकेय द्वारा तारकासुर का अंत करने के बाद उसके के तीनों पुत्रों ने देवताओं से बदले की भावना से ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या शुरू कर दी. फिर जब ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर तीनों से वरदान मांगने को तो उन्होंने कहा कि उनके लिए तीन ऐसी अद्भुत पुर का निर्माण किया जाए जो हवा में तैरते रहें और सिर्फ अभिजीत नक्षत्र में ही सीध में आए.

साथ ही उन्होंने कहा कि ये तीनों पुर तभी नष्ट हों जब एक शांतचित्त व्यक्ति असंभव रथ पर आए और एक निशान में अमोघ बाण से तीनों पुर पर वार करे. ब्रह्मा जी ने तीनों को वरदान दे दिया. सृष्टि के रचयिता से वरादान पाकर तीनों भाई यानी त्रिपुरासुर से सारे संसार में आतंक मचा दिया. हर ओर हाहाकार मच गया. देवता स्वर्ग छोड़कर भागने को मजबूर हो गए. स्वर्ग में त्रिपुरासुर का राज हो गया.

शिव जी ने बनाई त्रिपुराससुर के अंत की योजना
अंत में देवता शिव जी की शरण मेंं पहुंचे. देवताओं की प्रार्थना पर शिव जी ने त्रिपुरासुर के अंत करने की योजना बनाई. भगवान विष्णु स्वंय शिव जी के धनुष का बाण बने. बाण की नोक अग्नि देव बने. हिमालय धनुष बना और उसकी प्रत्यंचा बने शेषनाग. शिव जी के लिए दिव्य रथ विश्वकर्मा जी ने बनाया. रथ के पहिये सूर्य और चंद्रमा बने. वहीं इंद्र, कुबेर, यम और वरुण आदि देवता रथ के घोड़े बने.

भगवान शिव उस दिव्य रथ पर बैठे और शस्त्र लेकर युद्ध सथल पर गए, जहां तराकासुर के तीनों पुत्र अपने पुर में थे. उस समय अभिजीत नक्षत्र था और तीनों पुर एक सीध में थे. भगवान शिव ने अपने अमोघ बाण से निशाना साधा और चला दिया. बाण से दैत्य पुत्रों के तीनों पुर जलकर भस्म हो गए. इस तरह त्रिपुरासुर का अंत करने की वजह से भगवान शिव का त्रिपुरांतक नाम पड़ा.

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