Vedant Samachar

आरटीओ का ‘लोकतांत्रिक’ चमत्कार : जनता कतार में, एजेंट सरकार में…

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दुबेजी की दिव्य दृष्टि…

अगर लोकतंत्र की सबसे जीवंत झलक देखनी हो, तो विधानसभा या संसद मत जाइए, सीधे किसी आरटीओ (क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय) के प्रांगण में जाइए। वहाँ आपको असली लोकतंत्र दिखाई देगा — जहाँ “जनता” सचमुच जन है, और “सेवक” सचमुच सेवा लेता है।

कहते हैं, भारत बदल रहा है। लेकिन आरटीओ की दीवारों के भीतर समय ठहर-सा गया है। यहाँ अब भी वही पसीने से लथपथ भीड़, हाथ में फाइलें थामे बेबस लोग और “सर, बस एक साइन चाहिए…” की अनुनय-भरी आवाजें गूंजती हैं। और इसी बीच, किसी सरकारी टेबल के किनारे, अपने मोबाइल पर गेम खेलता एक कर्मचारी आपको ऐसे देखता है जैसे आप उसके जीवन में किसी पुराने दुश्मन की तरह लौट आए हों। आरटीओ ऑफिस में अधिकारी भले ही न मिलें, लेकिन आपको एजेंट्स जरूर मिल जाएंगे। वाहन निरिक्षण के लिए तैनात निरीक्षक अपनी कुर्सी से गायब रहते हैं। अगर मिल भी गए तो कहते हैं कि बाद में आना, अभी टाइम नहीं हुआ है। अब निरीक्षक साहब हैं, और भी कई काम रहते होंगे उनके पास।

जनता के लिए सेवा : एजेंट संस्करण
आइए एजेंटों की बात करें। वही एजेंट जो हर आरटीओ परिसर में किसी “स्थानीय देवता” की तरह प्रतिष्ठित हैं। उनके पास न तो कोई पद है, न पहचान-पत्र, लेकिन उनका प्रभाव ऐसा कि विभाग के बाबू तक भी उन्हें “भाईसाब” कहकर संबोधित करते हैं। आम आदमी लाइन में घंटों खड़ा रहता है, लेकिन अगर एजेंट साहब के पास किसी की फाइल हो, तो वह फाइल ऐसे उड़ती है जैसे सीधा वीआईपी गेट से प्रवेश मिल गया हो।

आप किसी भी आरटीओ में जाइए — आपको दो प्रकार के लोग मिलेंगे:
पहला, आम आदमी — जो “सर, फॉर्म भरना है” कहता है।
दूसरा, एजेंट — जो “सर, वो फाइल मैंने रखी थी न…” कहता है।
और फर्क देखिए — पहले को घूरा जाता है, दूसरे को सलाम किया जाता है।

“सेवा शुल्क” या वैधानिक लूट?
अगर आप अपने वाहन का फिटनेस सर्टिफिकेट खुद बनवाने की सोच रहे हैं, तो आपको कम-से-कम 6 बार चक्कर काटने पड़ेंगे, 4 अलग-अलग फॉर्म भरने होंगे और हर बार एक नया दस्तावेज़ “कमी” में पाया जाएगा। मगर यही काम अगर एजेंट के हवाले कर दें, तो “साहब” मुस्कुराकर कहेंगे — “आपका काम तो पहले ही हो गया था, बस सिस्टम अपडेट करना था।”

यह “सिस्टम अपडेट” दरअसल एजेंटों की कमाई का लाइसेंस है। 500 रुपये की फीस वाले काम का रेट सीधा 2000 रुपये तक पहुंच जाता है। और सबसे मजेदार बात — भुगतान भी पूरी “प्रोफेशनल ईमानदारी” से होता है: “आधा एडवांस, आधा फाइल निकलते ही।”

यह व्यवस्था इतनी पारदर्शी है कि शायद सरकार भी इससे कुछ सीख सकती है।

“भ्रष्टाचार मुक्त” का बैनर और नीचे एजेंट की मेज
आरटीओ दफ्तरों में एक बोर्ड जरूर चमकता है — “रिश्वत देना और लेना, दोनों दंडनीय अपराध हैं।” इस बोर्ड के नीचे ही एजेंट साहब की कुर्सी लगी होती है, जहाँ वह ग्राहकों को “सेवा पैकेज” बताते हैं।

और मजे की बात यह कि एजेंट न तो सरकार का कर्मचारी है, न ही उसे किसी कानूनी अधिकार की जरूरत है — क्योंकि उसे सिर्फ “पहचान” चाहिए। और पहचान के आगे कानून भी सलाम ठोक देता है।

“सिस्टम” का रहस्य — फाइलों की जुगलबंदी
अगर कोई आम आदमी किसी अफसर से पूछ बैठे — “सर, मेरा काम अभी तक हुआ क्यों नहीं?”
तो जवाब मिलेगा — “फाइल आगे नहीं बढ़ी।”
अब यह “आगे नहीं बढ़ी” वाली फाइल कहाँ रुकी है, यह कोई नहीं बता सकता। ऐसा लगता है मानो फाइलें आरटीओ की भूलभुलैया में खो जाती हैं। मगर जैसे ही वही फाइल किसी एजेंट के हाथ लगती है, वह रास्ता खुद-ब-खुद खुल जाता है। मानो फाइल में कोई GPS सिस्टम लगा हो जो सीधे सही टेबल तक पहुंचा दे।

जनता का अनुभव: दौड़, भाग और झुक
एक आम नागरिक के लिए आरटीओ जाना किसी मैराथन रेस से कम नहीं। पहले लाइन में लगो, फिर टोकन लो, फिर दस्तावेज़ की कमी पर झेलो, फिर किसी के “लंच टाइम” में फंसो। और आखिर में जब उम्मीद टूटने लगती है, तो एक आवाज आती है —
“भैया, एजेंट से करवा लो, दो घंटे में काम हो जाएगा।”

यह आवाज़ अब हर आम नागरिक के कानों में “मोक्ष-मंत्र” बन चुकी है।

सरकार की आंखें बंद, एजेंट की जेब खुली
सरकार दावा करती है कि उसने “ई-गवर्नेंस” लागू कर दिया है। लेकिन असल में यह “ए-गवर्नेंस” बन चुका है — A for Agent.
डिजिटल इंडिया के इस युग में जहाँ आदमी अपने मोबाइल से विदेशों में पैसे भेज सकता है, वहीं अपने ही शहर में ड्राइविंग लाइसेंस के लिए एजेंट को कमीशन देना पड़ता है।

सरकार शायद सोचती होगी कि जनता की परेशानी सुनने से बेहतर है उसे सहने की आदत डाल दो। और जनता भी अब समझदार हो चुकी है — वह जानती है कि व्यवस्था से नहीं, व्यवस्था के ‘संपर्क’ से काम होता है।

एजेंट ही असली ‘सारथी’ हैं
सरकार “सारथी पोर्टल” चला रही है, लेकिन असली सारथी तो वही एजेंट हैं, जो जनता की फाइलों को मंज़िल तक पहुंचाते हैं।
वे बिना पद, बिना पहचान के इस देश की अदृश्य सरकार हैं — जहाँ लोकतंत्र का असली मंत्र है:
“काम वही होता है, जो एजेंट कराता है।”

कभी-कभी लगता है, परिवहन विभाग अब विभाग नहीं, एक संस्कृति बन चुका है — जहाँ आम आदमी उम्मीद लेकर आता है, और अनुभव लेकर लौटता है।

और शायद यही भारत की “सुविधाजनक” व्यवस्था का सबसे बड़ा चमत्कार है.

फाइलें भले न चलें, लेकिन एजेंटों की दुकानें हमेशा चलती रहती हैं।

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