दावोस,22 जनवरी । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, जो अब तक ग्रीनलैंड को किसी भी कीमत पर हासिल करने और इसके लिए वेनेजुएला जैसी सैन्य कार्रवाई की बात कर रहे थे, उनके रुख में रातों-रात बड़ा बदलाव आया है। दावोस में आयोजित ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ में अपने 75 मिनट के संबोधन के दौरान ट्रम्प ने साफ कर दिया कि वे ग्रीनलैंड पर कब्जा तो करेंगे, लेकिन इसमें ताकत या सेना का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
पीछे हटने के 5 बड़े प्रमुख कारण बताये जा रहे हैं। पहला अमेरिका के वैश्विक दबदबे को चुनौती कनाडा के पीएम मार्क कार्नी सहित कई नेताओं ने दावोस में संकेत दिया कि अमेरिका का एकतरफा वर्चस्व अब खत्म हो रहा है। रूस और चीन जिस तरह से नए ग्लोबल अलायंस बना रहे हैं, उससे अमेरिका को डर है कि उसकी जगह ये देश न ले लें। पेंटागन की रिपोर्ट भी चीन-रूस को 2025 की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती बता चुकी है। दूसरा यूरोप की ‘ट्रेड वॉर’ की धमकी ट्रम्प के अड़ियल रवैये से NATO और यूरोपीय यूनियन (EU) बेहद नाराज हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने तीखे शब्दों में कहा कि टैरिफ का इस्तेमाल किसी देश की संप्रभुता छीनने के लिए करना मंजूर नहीं है। प्रतिक्रिया स्वरूप यूरोपीय संसद ने अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते (Trade Deal) पर रोक लगा दी है।
तीसरा NATO और UN के कड़े नियम चूँकि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और डेनमार्क NATO का सदस्य है, इसलिए ग्रीनलैंड पर हमला पूरे यूरोप पर हमला माना जाता। फिलहाल ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने अपने सैनिक तैनात कर दिए हैं। UN चार्टर के मुताबिक भी किसी संप्रभु देश पर ऐसी कार्रवाई अवैध है। चौथा गठबंधन टूटने का डर अगर अमेरिका डेनमार्क जैसे सहयोगी पर हमला करता, तो NATO के 32 देशों के बीच दरार पैदा हो जाती। कई यूरोपीय देश इस गठबंधन से बाहर निकल सकते थे, जिससे अमेरिका रणनीतिक रूप से दुनिया में अकेला पड़ जाता।
पांचवा कारण अमेरिका में ही भारी विरोध है। ट्रम्प की अपनी सेना के अधिकारी और रिपब्लिकन पार्टी के नेता इस योजना के खिलाफ हैं। ‘रॉयटर्स-इप्सोस’ के सर्वे के अनुसार, केवल 17% अमेरिकी ही ग्रीनलैंड पर कब्जे का समर्थन करते हैं। दिग्गज नेता मिच मैकोनेल ने इसे ‘रणनीतिक आत्मघाती कदम’ करार दिया है।



