दुबेजी की दिव्या दृष्टि
दक्षिण एशिया की राजनीति में हाल के दिनों में दो घटनाएँ चर्चा में हैं—बांग्लादेश में छात्र आंदोलन से हुई सत्ता परिवर्तन की घटना और नेपाल में भड़की हिंसा। दोनों घटनाओं में पैटर्न लगभग एक जैसा दिखाई दे रहा है।
बांग्लादेश: छात्रों ने गिराई सरकार
बांग्लादेश में सरकार को अजेय और मजबूत माना जाता था। लेकिन बेरोजगारी, बढ़ते भ्रष्टाचार और छात्रों की आवाज़ को दबाने के प्रयास ने चिंगारी को ज्वालामुखी में बदल दिया। सरकार ने सख़्ती दिखाई, इंटरनेट बंद किया, लेकिन नतीजा उल्टा निकला। सड़क पर उतरे छात्रों को आम जनता का साथ मिला और आंदोलन सत्ता पलट तक जा पहुंचा। प्रधानमंत्री शेख हसीना को अंततः पद छोड़ना पड़ा। यह सिर्फ छात्र शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह सबक था कि जब जनता और खासकर युवा वर्ग खड़ा हो जाता है, तो कोई भी सत्ता स्थायी नहीं रहती।
नेपाल: वही रास्ता, वही संकट
नेपाल में 8 सितंबर को सोशल मीडिया बैन के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ। यह मुद्दा युवाओं के गले की हड्डी बन गया। सरकार ने इसे तकनीकी कदम बताया, लेकिन युवाओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना। 9 सितंबर की सुबह जब बैन हटा भी लिया गया, तो उम्मीद थी कि तनाव कम होगा। मगर इसके उलट, गुस्सा और भड़क गया।
प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल के आवास पर कब्जा कर लिया, कांग्रेस मुख्यालय को जला दिया और पूर्व प्रधानमंत्रियों तक को निशाना बनाया। हालात इतने बिगड़े कि अब तक तीन मंत्री इस्तीफा दे चुके हैं। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के बारे में खबरें हैं कि वे दुबई जाकर इलाज और शायद शरण लेने की तैयारी में हैं। यह किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए गंभीर संकट का संकेत है।
समानताएं और फर्क
समानताएं: दोनों ही जगह आंदोलन का नेतृत्व छात्रों और युवाओं ने किया। सरकार की असंवेदनशील नीतियों ने गुस्से को हवा दी। विरोध सिर्फ नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्ता विरोधी जनआंदोलन में बदल गया।
फर्क: बांग्लादेश में आंदोलन ने सीधे सत्ता परिवर्तन का रूप ले लिया, जबकि नेपाल में अभी सत्ता पलट नहीं हुआ, लेकिन हालात उसी दिशा में बढ़ते नजर आ रहे हैं। नेपाल में हिंसा कहीं ज्यादा उग्र है और सरकारी संस्थानों को सीधा निशाना बनाया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नेपाल की मौजूदा स्थिति बांग्लादेश की घटनाओं की याद दिला रही है। जहाँ बांग्लादेश में छात्र आंदोलन सरकार के तख्तापलट तक पहुंचा, वहीं नेपाल भी उसी रास्ते पर बढ़ता दिखाई दे रहा है। सवाल अब यह है कि क्या नेपाल में भी सत्ता पलट अनिवार्य है या सरकार समय रहते हालात संभाल पाएगी।
सबसे बड़ा सबक
यह साफ है कि लोकतंत्र में युवाओं की उपेक्षा सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा है। सोशल मीडिया आज केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि असहमति की सबसे तेज़ आवाज़ है। बांग्लादेश और नेपाल दोनों ने यह दिखा दिया कि जब सरकारें युवाओं की नाराजगी को नज़रअंदाज़ करती हैं, तो आंदोलन सीधे सत्ता की जड़ों तक पहुंच जाता है।
नेपाल के हालात इस समय नाजुक मोड़ पर हैं। अगर सरकार ने ठोस, पारदर्शी और संवेदनशील कदम नहीं उठाए, तो बांग्लादेश का परिदृश्य नेपाल में भी दोहराया जा सकता है।



